राजेश तिवारी
रांचीः बीजेपी की नई प्रदेश कमेटी ने पूरे प्रदेश में कार्यकर्ताओं के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं. नई कमेटी पर नेताओं और कार्यकर्ताओं की खिच-खिच जारी है. अब विक्षुब्दों के स्वर भी तेज होने लगे हैं. नेताओं-कार्यकर्ताओं ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी है. कई वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में कई नेताओं के अहंकार के कारण भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा. कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रख्यात विधि विशेषज्ञ व पूर्व महाधिवक्ता अनिल सिन्हा, पूर्व गृह सचिव व वरीय आदिवासी बुद्धिजीवी जे.बी. तुबिद, झारखंड बार काउंसिल के वरीय उपाध्यक्ष जैसे प्रतिष्ठित पद पर दो बार निर्वाचित होकर आए राजेश शुक्ला और झारखंड चैम्बर ऑफ कॉमर्स के दो दो बार उपाध्यक्ष रहे दीनदयाल वर्णवाल जैसे वरीय प्रवक्ताओं में तिकड़ी को अपने लायक कोई ‘मेरिट’ नहीं दिखा. वहीं संथाल के कद्दावर विधायक व पूर्व महामंत्री अनंत ओझा एवं सिंहभूम के कद्दावर सांसद विद्युत वरण महतो को भी दरकिनार किया जाना लोगों को नहीं पच रहा.
प्रदीप वर्मा की भी है चर्चा
बीजेपी के नेताओं-कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रदीप वर्मा को तीन वर्ष पूर्व तक भाजपा के कार्यकर्ता ठीक से पहचानते भी नहीं थे. कुछ लोग बताते हैं कि सरला बिड़ला स्कूल के राजनीतिक इस्तेमाल ने उन्हें संघ और भाजपा में आगे पहुंचा दिया. 2014 लोकसभा चुनाव में उनपर भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी की बजाय किसी अन्य प्रत्याशी को सहयोग करने का आरोप चर्चा में था. फिर भी पिछली कमेटी में वह प्रदेश मंत्री बन गए थे. बाद में जोड़ तोड़ कर उपाध्यक्ष बन गए और उनकी महत्वाकांक्षाएं परवान चढ़ने लगीं. इस बार तो संगठन पर ही कब्जा कर लिया. कार्यकर्ता का यह भी कहना है कि संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह जिस ढंग से संगठन चला रहे हैं उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि वह अपने पूर्ववर्ती संगठन मंत्री राजेन्द्र सिंह की राह पर हैं और अपने राजनीतिक भविष्य की राह ढूंढने में लगे हैं. हाल के दिनों में उन्होंने भाजपा के संगठन मंत्री की परिभाषा बदलकर रख दी है. कई नेता अपनी पीड़ा बताते हुए भावुक हो जाते हैं. कहते हैं कि खून पसीने से जिस भाजपा को सींच कर बहुमत की सरकार बनवाई, उसी भाजपा में कतिपय नेताओं की लिप्सा ने झारखंड में झामुमो-कांग्रेस की राह आसान कर दी है. 65 प्लस के टारगेट का राग अलापते अलापते इन्ही नेताओं ने मिसगाइड कर भाजपा को 25 पर पहुंचा दिया.

