राहुल मेहता,
रांची: अंकित बहुदिव्यांगता से ग्रसित होने के बावजूद तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा था. अचानक सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया. अंकित को कुछ नहीं हुआ था, उसकी मां बीमार हो गयी थी. ऐसे अनेक मामले हैं, जहां देखभालकर्ता के बीमारी के कारण दिव्यंगजनों का पुनर्वास प्रक्रिया प्रभावित हुई है.
दीर्घकालिक बीमारी या दिव्यांगजनों के साथ काम करने वाले कई संगठन हैं, उनके लिए अनेक योजनायें हैं, लेकिन देखभालकर्ता, जिनमें से अधिकतर परिवार के सदस्य होते हैं- व्यापक रूप से उपेक्षित हैं.
लम्बे समय तक देखभाल करने का देखभालकर्ता के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. जिम्मेदारियों के बोझ तले वे समाज से कटते चले जाते हैं और अपनी जिंदगी भी नहीं जी पाते. समझौता उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है. लेकिन अधिकतर देखभालकर्ता इन सभी से दुखी नहीं हैं, उनकी व्यथा तो यह है कि इतने के बावजूद उनके त्याग, मेहनत, तपस्या को कोई पहचान नहीं मिलती.
केयर वर्ल्डवाइड ने देखभालकर्ताओं के इस दुखती रंग को पहचाना. एक डाउन सिंड्रोम बच्ची के पिता भारतवंशी अनिल पाटिल के प्रयास से ब्रिटेन में केयर वर्ल्डवाइड की स्थापना की गयी. केयर वर्ल्डवाइड का मानना है कि दिव्यांगजनों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए देखभालकर्ताओं की पहचान, सहयोग और अवसरों की आवश्यकता होती है. यह उनके जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार लाता है.
केयर वर्ल्डवाइड ने देखभालकर्ताओं के जीवनस्तर में सुधार के लिए एक मॉडल तैयार किया है, जिसके मुख्य रणनीति हैं- देखभालकर्ताओं का समूह निर्माण, स्वास्थ्य सहायता, भावनात्मक सहयोग, परामर्श एवं आयवृद्धि कार्यक्रम.
केयर वर्ल्डवाइड ने झारखण्ड में भी नव भारत जागृति केंद्र के माध्यम से अपने प्रयासों को धरातल पर उतारा है. एक देखभालकर्ता की एक कथन इस प्रयास को चंद शब्दों में व्यक्त करते हैं “पहले आगे क्या होगा कि चिंता से ही निराश थे, केयर वर्ल्डवाइड एवं नव भारत जागृति केंद्र के साथ से लगने लगा है कि हम अकेले नहीं हैं, हमारी भी जिन्दगी है, थोड़ी सी पहचान और सहयोग से हम हर बाधा पर कर लेंगे.”

