दिल्ली: हर साल ‘विजय दिवस’ (Vijay Diwas) के तौर पर मनाई जाने वाली 16 दिसंबर की तारीख, भारत ही नहीं दुनिया के इतिहास में भी खासी अहमियत रखती है. 49 साल पहले 1971 की जंग (1971 Indo Pak War) में भारत ने पाकिस्तान को ना केवल धूल चटाई, बल्कि पड़ोसी मुल्क के दो टुकड़े भी हो गए, जिसके बाद बांग्लादेश अस्तित्व में आया. उस जंग में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने सरेंडर किया था. लेकिन भारत के 54 फौजियों के बारे में आज तक पता नहीं लग सका.
पाकिस्तान के 93 हजार सैनिक तो छोड़ दिए लेकिन….
1971 की जंग के बाद हुए शिमला समझौते में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को वापस भेजा गया. हालांकि सरकार ने भारत के 54 लापता सैनिकों को लेकर कोई समझौता नहीं किया. 1979 में संसद में अमर सिंह पठावा के सवाल के जवाब में विदेश मंत्री समरेंद्र कुंडू ने लोकसभा में लिस्ट जारी की, जिसमें 40 लापता सैनिकों के नाम थे. इसमें उन जेलों के बारे में भी बताया गया था, जहां इन सैनिकों को रखा गया. बाद में इस लिस्ट में 14 नाम और भी जुड़ गए.
’मैं पाकिस्तान की जेल में बंद हूं’…जुल्म की कहानी
मेजर कंवलजीत सिंह इकलौते ऐसे अफसर थे, जिन्होंने भारत-पाकिस्तान की जंग एक हाथ से लड़ी. कहा जाता है कि अगर कंवलजीत न होते तो आज पंजाब का फिरोजपुर पाकिस्तान में होता. उनकी पत्नी जसबीर कौर और इकलौती बेटी आज भी उनकी राह तक रही हैं. 71 की लड़ाई के 12 साल बाद उन्हें गुरुमुखी में लिखा हुआ पत्र मिला था, जिसमें कंवलजीत ने पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद होने के साथ ही अपने साथ हुए जुल्म को भी बयान किया था. पत्नी कहती हैं- ‘ना..! मेजर कंवलजीत सिंह ‘थे’ मत बोलिए. वो हैं. जिंदा हैं.’
खत, किताब, पोस्टकार्ड देते रहे जिंदा होने की गवाही
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लापता हुए मेजर अशोक सूरी का खत 1974 में खत आया था. उन्होंने परिवार को भेजे खत में जिंदा होने की बात कही थी. सेना उन्हें Killed in Action घोषित कर चुकी थी. अगले साल 1975 में कराची से आए एक पोस्टकार्ड में 20 भारतीय सैनिकों के जीवित होने की बात लिखी थी. 1980 में विक्टोरिया शॉफील्ड की किताब ‘Bhutto- Trial And Execution’ में एक ऐसी जेल का जिक्र किया गया, जिसमें भारतीय सैनिक कैद थे.
रेडियो से हुई थी विंग कमांडर के जिंदा पकड़े जाने की घोषणा
जंग के दौरान विंग कमांडर एच. एस. गिल का प्लेन पाकिस्तान में जा गिरा था. ‘हाई स्पीड’ के नाम से फेमस गिल के जिंदा पकड़े जाने की पुष्टि पाकिस्तान के रेडियो में हुई घोषणा के जरिए हुई थी. 18 साल बाद रिहा हुए मुख्तियार सिंह नाम के एक स्मगलर ने कैप्टन रविंदर कौरा के उसी जेल में बंद होने की पुष्टि की थी. जंग के पहले ही दिन लापता हुए मेजर एस.पी.एस. वराइच की बेटी और मिसिंग डिफेंस पर्सनल रिलेटिव असोसिएशन (MDPRA) की सदस्य सिम्मी वराइच का कहना है कि सरकार को लापता सैनिकों के बारे में स्थिति स्पष्ट कर इसकी जानकारी उनके परिवार को देनी चाहिए.
सरकार से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक जा चुके हैं परिजन
1983 और 2007 में लापता सैनिकों के परिजन पाकिस्तान की जेलों में भी गए, लेकिन खाली हाथ ही लौटे. इन लापता सैनिकों के परिजन सरकार के साथ ही संयुक्त राष्ट्र से लेकर अंतरराष्ट्रीय संगठनों के दरवाजे खटखटा चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट में 2015 में सुनवाई के दौरान सरकार का जवाब था- ‘हमारा मानना है कि उन सभी सैनिकों की मौत हो गई होगी. पाकिस्तान इन लोगों के कैद में होने की बात से इनकार करता रहा है.’
दुनिया के सामने हमेशा झूठ बोलता रहा पाकिस्तान
युद्ध के मैदान में भारत के सामने कभी नहीं टिक पाया पाकिस्तान भी 1989 तक अपनी जेल में इन लापता सैनिकों के होने की बात को खारिज करता रहा. लेकिन बेनजीर भुट्टो ने सत्ता संभालने पर इस बात को स्वीकार किया था. हालांकि इसके बाद फिर से पाकिस्तान ने सैनिकों की बात को सिरे से खारिज ही किया. पत्रकार चंदर एस. डोगरा ने अपनी किताब ‘Missing in Action: The Prisoners Who Did Not Come Back’ में दावा किया है कि मई 1984 में दोनों देशों के विदेश सचिवों की मुलाकात के दौरान पाकिस्तान ने लापता सैनिकों के नाम वाले बंदियों के होने की बात को स्वीकार किया था.

