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जब साकची को कोई नहीं था जानता

जमशेदजी टाटा की पुण्यतिथि विशेष 19 मई 1904

by bnnbharat.com
May 20, 2020
in Uncategorized
जब साकची को कोई नहीं था जानता

जब साकची को कोई नहीं था जानता

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जमशेदपुर: जमशेद जी टाटा की कहानी भारत के तरक्की की दास्तां, गुलामी से आजादी की ओर का इतिहास है. जमशेदजी टाटा जिस शख्सियत का नाम है उसने उस दौर में अपनी काबिलियत, देशभक्ति और कारोबार करने का ईमानदारी तरीका दिखाया. जब अंग्रेजी सिक्का चलता था. गुलामी के दिन थे, मगर जमशेदजी ने अपनी सोच,जिद और दूरदर्शिता की वजह से अंग्रेजों को भी झुकने सीखने पर मजबूर कर दिया. तभी तो लंदन टाइम्स के रिपोर्टर ने साल 1911 में इस शहर का दौरा किया तो लिखा ’’ ये शहर ना सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के तमाम औद्योगिक घरानों के लिए एक मॉडल है’’ लंदन टाइम्स के रिपोर्टर ने ये बातें तब लिखी थीं जब जमशेदपुर का नाम जमशेदपुर नहीं हुआ था. साकची गांव पूरी तरह जिंदा थी और कालामाटी इतिहास के धूल में था. जमशेद जी और आज के टाटानगर की कहानी आनेवाली कई पीढ़ियों के लिए भी उतनी प्रेरणादायक हैं जितनी की इस पीढ़ी के लिए. निराशाओं, गुलामी के बीच पूरे जोश के साथ लक्ष्य हासिल करने की कला अगर किसी में थी तो वो थे जमशेदजी नुसरवानी जी टाटा. एक पारसी. जिसने कॉटन मिल के जरिए कारोबार करने की क्षमता तो दिखा दी थी लेकिन किसी ने 1870 के दशक में ये सोचा भी नहीं होगा की रूई सी मुलायम सी चीज का ये कारोबारी कभी लोहे जैसी सख्त धातु का सबसे बड़ा कारोबारी बन जाएगा.

2 जनवरी 1919 जमशेदपुर का नामकरण

लोहे की असली कहानी

भारत को लोहे की ताकत देने वाली पूरी कहानी से पहले लौह उद्योग की शुरुआत दिनों की मुश्किलों को समझना भी जरुरी क्योंकि इसी आधार पर हम जमशेदजी टाटा की मेहनत और दूरदर्शिता का एहसास कर सकते हैं. साल 1853 में यानी जंग ए आजादी की पहली लड़ाई 1875 की क्रांति से 4 साल पहले दक्षिण भारत में आयरन फैक्टरी स्थापित करने की कोशिश की गई. नाम था ’ईस्ट इंडिया आयरन कंपनी’। 4 लाख पाउंड से इस फैक्टरी की शुरुआत हुई. साल 2020 में इस लेख को पढ़कर आप हैरान हो जाएंगें कि ’ईस्ट इंडिया आयरन कंपनी’ ने लोहा निकालने की जिस फैक्टरी को खोलने का फैसला किया था उसे चारकोल यानी की लकड़ी के कोयले से चलाना था.

इसीलिए ’ईस्ट इंडिया आयरन कंपनी’ ने मद्रास राज्य के चारों बसे घने जंगलों के सहारे चारकोल का जुगाड़ करने का फैसला किया था. तीन प्लांट बैठाए गए- पहला कावेरी नदी पर दूसरा तिरनोमलाई के आरकोट और तीसरा पश्चिमी घाट पर. ये तीनों घने जंगलों में से घिरे थे. ’ईस्ट इंडिया आयरन कंपनी’ को उम्मीद थी कि इन जंगलों से इतनी लकड़ियां मिल जाएंगी की आयरन फैक्टरी में उत्पादन पर्याप्त मात्रा में होगी. ये उनकी बड़ी भूल थी. तमाम कोशिशों के बाद भी 15 सौ टन से ज्यादा चारकोल का इंतजाम नहीं हो सका और एक टन लोहा निकालने के लिए साढ़े तीन टन चारकोल लग जाता था. ये बेहद ही घाटे का सौदा था.  जे मार्शल हीथ ने 1830 ईस्वी में भारत में स्टील इंडस्ट्री लगाने की जो कोशिश की थी उसमें उन्हें आखिकार नाकाम होना पड़ा. धीरे-धीरे सारे प्लांट बंद हो गए . उधर इंग्लैंड में लोहा बनाना आसान होता चला गया, नई तकनीक के आगे हीथ की कंपनी नाकाम साबित हुई. इतनी नाकाम की 1874 में जब चेन्नई के पास पोर्टो नोवो के स्टील वर्क्स में ताला लगा तब चारकोल आधारित आयरन फैक्टरी लगाने की सोचने की भी हिम्मत किसी ने नहीं की. ऐसा नहीं थी जे मार्शल हीथ ने गलत कदम उठाया था, उनकी कोशिश आज भी इतिहास में दर्ज है नाकामी की वजह रही चारकोल रही.

जब दक्षिण में नहीं गला लोहा

दक्षिण में नाकामी मिली तो एक और अंग्रेज ने छोटानागपुर के कालाडुंगी में लोहे की फैक्टरी लगाने की कोशिश की मगर नाकामी हासिल हुई. उस वक्त के भारतीय भूगर्म सर्वेक्षण के निदेशक सर थॉमस हॉलैंड ने कहा था की आज भी फरनेस के अवशेश मिलते हैं. इसके बाद थोडी कोशिश और आगे बढ़ी तो झरिया कोल फिल्ड में साल 1875 में बराकर नदी के पास फैक्टरी लगाई गई. 1889 में इसे बंगाल आयरन एंड स्टील को दे दिया गया. कंपनी के मालिक थे मेसर्स मार्टिन एंड कंपनी. इस फैक्टरी में भी सिर्फ 8 टन पिग आयरन का उत्पादन होता था, गुणवत्ता के नजरिए से भी ये उत्साहित करने वाला नहीं था.

जमशेदजी ने लोहे का देखा ख्वाब

काशीपुर ऑर्डिनेंस फैक्टरी के सुपरीटेडेंट जनरल आर एस माहोन ने साल 1899 में एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें दुनिया भर में स्टील की मांग के मद्देनजर भारत में हर हाल में आयरन और स्टील फैक्टी की जरुरत बताई.उन्होंने बर्मा से लाइमस्टोन लाने की बात भी कही साथ ही लौह अयस्क के लिए रिपोर्ट तैयार की मगर उनकी इस रिपोर्ट पर ज्यादा काम नहीं हुआ, उस वक्त ये मालूम भी नहीं था की झारखंड में दुनिया का सबसे बेहतरीन लौह अयस्क मौजूद है, हांलाकि झरिया कोल फिल्ड की जानकारी सभी को थी.यही वक्त था जब जमशेदजी टाटा ने भारत में अपनी स्टील की फैक्टरी लगाने की सोची. यहां ये भी बताना जरुरी है की जमशेदजी टाटा के दिल में स्टील फैक्टरी को लेकर पहले से ही बहुत कुछ चल रहा था। जब नागपुर में कपड़े की मिल चलती थी तब जमशेदजी को कुछ सरकारी दस्तावेज देखने को मिली.’’त्मचवतज वद जीम पिदंदबपंस चतवेचमबजे वि पतवद ूवतापदह पद जीम ब्ींदकं कपेजतपबज’’ नाम की इस रिपोर्ट को एक जर्मन एक्सपर्ट रिटर वॉन स्वार्ज ने तैयार की थी.चंदा जिला आज के महाराष्ट्र जिले चंद्रपुर का पुराना नाम है.इस रिपोर्ट पर भी बहुत काम नहीं हुआ लेकिन जमशेदजी टाटा के दिमाग में जैसे लोहे ने अपना घर बना लिया हो वो रात दिन फैक्टरी के बारे में सपने देखने लगे.ना सिर्फ सपना बल्कि जहां भी उनको लोहे की जानकारी मिलती थी वो उसे पढ़ते, चर्चा करते समझने की कोशिश करते की कैसे सफल हुआ जा सकता है.उनके दिमाग में लगातार प्लानिंग चल रही थी.सेंट्रल प्रॉविंस में ’लोहारा’ नाम की कई जगहों का दौरा भी किया.

टाटा के प्रस्ताव से अंग्रेजों के होश उड़े

 

ऐसा माना जाता रहा है की ’लोहारा’ के अर्थ लोहा है. विदेश दौरे से भारत लौटने पर जमशेदजी टाटा ने सेंट्रल प्रॉविंस के कमीश्नर सर जॉन हेनरी मॉरिस से मुलाकात की और चंदा(चंद्रपुर) जिले के ’लोहारा’ में आयरन फैक्टरी लगाने का प्रस्ताव रखा, टाटा के इस प्रस्ताव से कमीश्नर सर जॉन हेनरी मॉरिस के तो मानों होश उड़ गए, उन्हें यकीन ही नहीं हुआ की कोई ऐसा भी सोच सकता है.लेकिन टाटा पूरी योजना के साथ आए थे, उन्होंने वरोरा कोल ब्लॉक और लोहारा में लौह अयस्क की खानों का जिक्र करते हुए वर्धा से वरोरा तक रेलवे लाइन तक का प्रस्ताव रखा लेकिन उस वक्त अंग्रेजी अधिकारी भारतीय को शक के नजरिए से देखा करते थे, खासतौर से निजी क्षेत्र में निवेश से तो उन लोगों की शंका और बढ़ जाती थी इसीलिए प्रस्ताव हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में चला गया.

जमशेदजी ने नहीं मानी हार

लेकिन टाटा का सपना मरा नहीं. उन्होंने 20 साल और इंतजार किया.साल 1899 में लॉर्ड कर्जन में भारत में माइनिंग पॉलिसी में बड़ा परिर्वतन किया. कई सुधार किए गए, सरकार ने कई तरह की रियायतें भी दी. इन दशकों में जमशेदजी टाटा की नजर से लोहे से जुड़ी कोई भी जानकारी जो छपी हो बच नहीं सकी.इस खबर ने तो जैसे उनके सपनों को पर लगा दिए.

अंग्रेजों को समझाते रहे

एक साल बाद साल 1900 में जमशेदजी टाटा इंग्लैंड गए और वहां उनकी मुलाकात फिर से लॉर्ड जॉर्ज हैमिल्टन से हुई.टाटा ने हैमिल्टन को फिर अपने लोहे के सपने की बात बताई.लॉर्ड जॉर्ज हैमिल्टन भारत में 4 साल अंडर सेक्रेट्री और 7 साल स्टेट सेक्रेट्री रह चुके थे उन्होंने मदद का भरोसा दिया और वायसराय लॉर्ड कर्जन को चिट्ठी लिखने की बात भी कही लेकिन जमशेदजी चाहते थे की इंग्लैंड में सेक्रेट्री ऑफ स्टेट इस पर फैसला करे.जॉर्ज हैमिल्टन ने टाटा से पूछा की जब वायसराय वहां है तो आखिर इंग्लैंड में बात करने की जरुरत क्या है लेकिन जमशेदजी ने जवाब दिया की ’’वायसराय आते जाते रहते हैं, उन्होंने योजना शुरु कर दी और भारत में मौजूद अधिकारियों से बात नहीं बनी तो उनकी पूंजी फंस जाएगी.’’ दरअसल टाटा अपने हिन्दुस्तान को अच्छी तरह समझते थे वो देश का कर्ज हर हाल में उतारना चाहते थे इसीलिए उन्होंने पूरी प्लानिंग के साथ अपनी बातें इंग्लैंड में रखी.जॉर्ज हैमिल्टन ने वायसराय को चिट्ठी भी लिखी .

जब टाटा से हुई गलती

भारत लौटने पर आश्वस्त जमशेदजी ने आयरन एंड स्टील फैक्टरी के लिए आवेदन दे दिया.आप सोच रहे होंगे की ये आवेदन आज के जमशेदपुर के लिए था तो गलत होंगे क्योंकि टाटा ने महाराष्ट्र के चंदा (चंद्रपुर) के लोहारा और पीपलगांव में प्रोजेक्ट लगाने का आवेदन दिया था.टाटा ने सेंट्रल प्रॉविंस के कमीश्नर सर एंड्रयू फ्रेसर को सौंपा.यहां टाटा से गलती ये हुई की उन्होंने काम को एजेंट के द्वारा कराने का फैसला किया जो अनुभवहीन थे.ये आवेदन भी फाइलों में दबा रहा.

जब जमशेदजी को हुआ अफसोस

दो साल बाद साल 1902 में जमशेदजी टाटा एक बार इंग्लैंड गए. 4 जुलाई 1902 को उन्होंने दोराब जी चिट्ठी लिखी “ मुझे ये बताते हुए अफसोस हो रहा है की अभी तक हमारी आयरन फैक्टरी को लेकर कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिला.हर कोई खुद में ही व्यस्त है. अगले सप्ताह सेक्रेट्री ऑफ स्टेट ने इस मामले में बात करने का भरोसा दिया है.’’ लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई.जमशेदजी निराश तो हुए लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी.आयरन फैक्टरी को लेकर वो कितने आशावान थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की वे लौह अयस्क और कोयला साथ लेकर गए थे ताकी जांच पड़ताल की जा सके.उन्होंने सर बेजोन जी दादाभाई को चिट्ठी लिख कर बताया कि ’’ कोकिंग कोल को लेकर मैंने जर्मनी और अमेरिका में कुछ प्रयोग करवाए हैं.मैं अगले सप्ताह जर्मनी और अमेरिका जानेवाला हूं.अमेरिका में मुझे सर क्लिंटन डॉकिंस ने वादा किया है की वो उनकी मदद करेंगे.

जब टाटा का उड़ा मजाक

जमशेदजी टाटा ने अमेरिका और जर्मनी में वक्त बिताया और जब वो सितंबर में इंग्लैंड लौटे तो फिर उन्होंने दोराबजी को चिट्ठी लिखी और अपनी निराशा जताई.वो लगातार ब्रिटिश अधिकारियों से मिलने की कोशिश करते रहे लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई.जमशेदजी अमेरिका चले गए और वहां भी आयरन फैक्टरी लगाने को लेकर चर्चाएं करते रहें , इस दौरान अमेरिकी पत्रकारों से भी मुलाकात होती रहीं, खबरें छपती रहीं इसी दौरान एक ऐंग्लो इंडियन अखबार ने मजाकिया लहजे में रिपोर्ट छाप दी की जमशेदजी भारत के जे पी मोर्गन बनना चाहते हैं और हैदराबाद के निजाम के करीबी हैं.

दिल्ली दरबार में अनजान जमशेदजी

खैर ये कहानी लंबी है लोहे की फैक्टरी का सपना लिए टाटा इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका का दौरा करते रहे.1902 के आखिरी महीने दिसंबर के शुरुआती दिनों में वो हिन्दुस्तान वापस लौटे.मुंबई लौटने के दो दिनों बाद वे दिल्ली गए जहां किंग एडवर्डसेवंथ के सम्मान में लॉर्ड कर्जन भव्य आयोजन किया था दरबार लगाया था.हालांकि जानकार हैरान होगी जमशेदजी उस वक्त साधारण व्यक्ति ही बन गए थे उनका नाम तक विजिटर लिस्ट में नहीं था.दोराब जी के भारत लौटने पर उन्होंने आयरन फैक्टरी पर ध्यान केंद्रीत करने की सलाह दी.इन दिनों जमशेदजी की सेहत भी खराब रहने लगी थी ।

लाइसेंस करना पड़ा था सरेंडर

इस दौरान चंदा जिले के प्रोजेक्ट का काम भतीजे शापुरजी सकलटवाला देख रहे थे.चंदा और लोहारा प्रोजेक्ट में जमशेदजी के बेटे दोराबजी टाटा और भतीजे शापुरजी ने बड़ी मेहनत की, जंगलों के खाक छाने, बैलगाड़ी में रात बीताई मगर कामयाबी हासिल नहीं हुई, प्लांट लगाने में कई तरह की तकनीकी दिक्कतें आने लगी तो आखिरकार थक कर टाटा ने चंदा प्रोजेक्ट का लाइसेंस सरेंडर कर दिया.सरेंडर करने के दौरान जब दोराबजी नागपुर गए तो उनकी नजर म्यूजियम में जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के मैप पर पड़ी पर जिसमें दुर्ग में लोह के खानें होने का जिक्र था.उम्मीद फिर जगी.अब दुर्ग और जबलपुर की ओर टाटा के सपनों को पूरा करने के लिए रुख किया गया.मगर यहां भी कामयाबी नहीं मिली.

साकची एक संयोग

टाटा को फिर एक मयूरभंज के महाराजा के पास से चिट्ठी आई. ये चिट्ठी लिखी थी पीएन बोस ने जिन्होंने जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के लिए मैप तैयार किया था. महाराजा ने ओडिशा में लोहे की खान का जिक्र किया और टाटा से यहां काम शुरु करने का प्रस्ताव रखा. इसी दौरान काम शुरु भी सरायकेला के खरसावां इलाके के सिनी में कैंप लगाना शुरु हुआ, प्रोजेक्ट इंजीनियर एक्सेल साहलिन अमेरिका से भारत पहुंचे तो जानकर हैरानी हुई की प्रोजेक्ट का स्थान सिनी से बदलकर साकची कर दिया गया. वजह बताई गई की सिनी में जमीन की दिक्कते हैं और पानी की भी कमी है.साकची वही जगह है जहां आज का टाटा स्टील प्लांट है.साकची गांव कालामाटी स्टेशन से 20 किलोमीटर दूर था ।कालामाटी स्टेशन बंगाल-नागपुर स्टेशन के अंतर्गत आता था.प्लांट के लिए साकची का चुनाव भी एक संयोग ही ही था, रेलवे के सर्वेक्षण के दौरान साकची में भी प्लांट लगाने की बात सूझी.

जब पड़ी टाटा की नींव

दरअसल साकची के नजदीकी स्टेशन कालामाटी से कोलकाता की दूरी 152 मिल पड़ती थी जबकि सिनी से कोलकाता की दूरी 171 मिल.साथ ही साकची और गोरुमहिसनी(यहां पर लौह अयस्क खी खाने थीं) की दूरी कम थी इतना ही नही खरकई और सुवर्णरेखा नदी भी पास में ही बहती थी और उस वक्त ये मशहूर था की किसी ने आज तक इन दोनों नदियों को सूखते हुए नहीं देखा.प्रोजेक्ट इंजीनियर साहलीन ने साकची को बेहतर जगह बताया और बिना देरी किए काम शुरु करने की बात कही.27 फरवरी 1908 को काम शुरु हुआ और फावड़ा पड़ते ही जैसे किस्मत खुल गई।यहां हर वो चीज मिल रही थी जो प्लांट के लिए जरुरी पड़ने वाली थी.1908 में काम शुरु हुआ तो डैम बने, रहने वालों के लिए क्वार्टर बनने लगे और 2 दिसंबर1911 में टाटा स्टील एंड आयरन कंपनी ने पहला लोहा तैयार किया.

जब साकची का नाम हुआ ’जमशेदपुर’

2 दिसंबर 1911 जश्न का दिन था मगर अफसोस इस बात का जिस लोहे का सपना जमशेदजी टाटा ने 40 सालों से हर दिन देखा वो कभी साकची आ भी नहीं सके.उनकी निधन 1904 में हो चुका था लेकिन मौत से पहले उन्होंने अपने परिवार और बेटे दोराबजी टाटा को ये सीख जरुर दे दी की कभी लोहे के सपने को छोड़ना नहीं, काम जारी रहना चाहिए चाहे इसके लिए कितनी भी कीमत चुकानी पड़े.2 जनवरी 1919 को भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने टाटा स्टील की प्लांट का दौरा किया, साकची शहर देखने आए थे, कोलकाता से उनके लिए विशेष ट्रेन चलाई गई थी। एक समारोह में उन्होंने साकची को जमशेदपुर नाम दिया.अपने भाषण में चेम्सफोर्ड ने कहा ’’ ये विश्वास करना मुश्किल है कि आज से 10 साल पहले यहां जंगल और झाड़ियां ही मौजूद थीं, आज यहां फैक्टरियां हैं, वर्कशॉप हैं और करीब 45 से 50 हजार की आबादी रहती है.ये सब इसलिए हुआ क्योंकि इसके पीछे जमशेद जी नुसरवानी जी टाटा की महान शख्सियत की सोच, कल्पना थी.आज इस मौके पर उनकी संतान सर दोराबजी के समक्ष मुझे ऐलान करते हुए खुशी हो रही की इस शानदार जगह को अब साकची नहीं जमशेदपुर के नाम से जाना जाएगा.

 

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