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जानें दिव्यांगों के लिए फेस मास्क क्यों बन गया है मुसीबत ?

by bnnbharat.com
June 19, 2020
in समाचार
जानें दिव्यांगों के लिए फेस मास्क क्यों बन गया है मुसीबत ?
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नई दिल्ली: कोरोना से बचाने वाला फेस मास्क दिव्यांगों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है? कोविड-19 संक्रमण के बचाव में सबसे बड़ा हथियार मास्क मूक-बधिरों के लिए परेशानी का सबब साबित हो रहा है. दरअसल वे लोगों के होठों को पढ़कर (लिप रीडिंग) और सांकेतिक भाषा (साइन लेंग्वेज) के जरिये संवाद करते हैं. लेकिन मास्क से चेहरा ढका होने के कारण अब उन्हें संवाद करने में दिक्कत हो रही है. राष्ट्रीय बधिर संगठन के कार्यकारी निदेशक अनुज जैन के मुताबिक सांकेतिक भाषा केवल हाथ के इशारों की नहीं बल्कि हाथों की हरकतों, चेहरे के भाव और शरीर की भाषा का मेल है. ऐसे में मूक-बधिरों को कई समस्या हो रही हैं.

उन्होंने कहा कि आज मास्क लगाना एक मजबूरी बन गया है. जो ऐसा नहीं कर रहा उसे दंडित किया जा रहा है.  इस समय ऑनलाइन ही संवाद का सबसे बेहतरीन जरिया है. लेकिन जब हमें आमने-सामने होकर बात करनी पड़ती है तो हमें मास्क उतारना पड़ता है, जिससे संक्रमण होने का खतरा बना रहता है. संवाद में दिक्कत की वजह से लॉकडाउन के दौरान कई दिव्यांग अपने घरों से हजारों किमी दूर जहां तहां फंसे रह गए. उन्हें बसों और ट्रेनों में सवार होने में दिक्कत हुई. ऐसी कई घटनाएं भी सामने आईं जहां संवाद नहीं कर पाने की वजह से पुलिस ने उन्हें पीटा. इंदौर स्थित आनंद सेवा समिति के निदेशक ज्ञानेंद्र पुरोहित के मुताबिक जब इन्हें क्वारंटीन केंद्रों में भेजा गया तो वहां भी संवाद में कमी के चलते कोई इनकी समस्याओं को नहीं समझ पा रहा है. क्या वे भूखे या प्यासे हैं या फिर वे अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं.

पुरोहित ने बताया कि मार्च में गुरुग्राम में फंसे दस मूक-बधिरों की खबर पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी मोनिका (दोनों ही सांकेतिक भाषा का विशेषज्ञ) के साथ ऐसे लोगों से जुड़ने के लिए ऑनलाइन कैंपेन चलाया. सरकार की मदद से अबतक 350 मूक बधिरों को उनके घर पहुंचाया गया है और वीडियो कॉल के जरिये उनके संपर्क में हैं.

वहीं, फास्ट फूड चेन केएफसी ने जब पाया कि उसके यहां कार्यरत 200 मूक-बधिरों को काम करने में दिक्कत हो रही है तो उसने अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव करते हुए विशेष तौर से तैयार पोस्टर, मेन्यू कार्ड, राइटिंग पैड और पेन के इस्तेमाल शुरू कर दिया है ताकि संवाद में कोई गलतफहमी न हो.  विशेषज्ञों का मानना है कि इन्हें परीक्षण देने के साथ ही जागरूक करने की जरूरत है. साथ ही पारदर्शी मास्क और सुनने वाले यंत्रों के प्रत्यर्पण की जरूरत है.

 

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