पटना: पूरे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव लगातार नीतीश कुमार के नाकामियों को उजागर करते रहे और आक्रामक तेवर अपनाते रहे. अब जब सरकार में वह नहीं आ पाए तो भी तेजस्वी यादव जनता को यह बताने में जरूर कामयाब रहे कि वे अब काफी हद तक परिपक्व नेता बन चुके हैं.
हालांकि इसके साथ ही कई चुनौतियां भी उनके सामने हैं. सबसे पहले तो उनपर महागठबंधन को बचाए रखने की जिम्मेदारी है क्योंकि सत्तारूढ़ खेमा लगातार इस अलायंस के टूटने का दावा कर रहा है. इसके साथ की कई अन्य अहम चुनौतियां भी तेजस्वी के सामने हैं जिन्हें फेस करते रहना है. मकर संक्रांति (खरमास बीतने) के बाद अब ये और बढ़ने वाली हैं.
तेजस्वी के सामने सबसे जरूरी अपनी छवि को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करना होगा. दरअसल यह देखा गया है कि बिहार में किसी मुद्दे पर जब भी विपक्ष के नेता की सबसे अधिक जरूरत होती है तो तेजस्वी यादव अक्सर गायब हो जाते हैं. चाहे वह चमकी बुखार का मामला हो, बाढ़ का मामला हो अथवा कोरोनावायरस संक्रमण के दौर में उनका गायब हो जाना हो. लोकसभा चुनाव के दौरान तो उनके 40 दिन की गैर हाजिरी तो सभी को खल गई थी. ऐसे में विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को स्थापित करना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
घटक दलों को एकजुट रखना तेजस्वी के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी क्योंकि कांग्रेस सहित कई पार्टियों ने यह कहा है कि लालू यादव की बात कुछ और थी. तेजस्वी यादव सीख रहे हैं पर उस मुकाम पर पहुंचना अभी शेष है. यहां तक कि राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने भी तेजस्वी की नेतृत्व क्षमता को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठा दिया था. जाहिर है इसको साथ रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी.
तेजस्वी यादव के साथ बड़ी चुनौती यह भी है कि खुद को परिपक्व नेता के तौर पर स्थापित करने के साथ ही कांग्रेस के विधायकों की टूट को बचाना भी उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी होगी. यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी क्योंकि खतरा सबसे ज्यादा कांग्रेस पर ही है. वजह यही है कि उनके 19 विधायक हैं जिनमें से 13 विधायकों के टूटने की स्थिति में कांग्रेस लगभग खत्म हो जाएगी.
माप तौल के साथ तेजस्वी यादव को परिपक्व नेता बनने की चुनौती होगी क्योंकि जब वह सरकार को घेर रहे होंगे तो फैक्ट्स एंड फिगर को सही रखना होगा जो कि तार्किक आधार पर सरकार को कटघरे में खड़ा करें और सरकार को चुनौती दे. तेजस्वी में हालांकि इस बात की कमी है, लेकिन यह भी सत्य है कि तेजस्वी के अलावा बिहार में कोई ऐसा नेता भी नहीं है जो कि सरकार के सामने खड़ा होता है. ऐसे में तेजस्वी का चैलेंज और भी बढ़ जाता है.
वामपंथी दलों को साथ लाने के साथ ही उनकी एक तरह से कहीं ना कहीं कुछ तबके में नेगेटिव छवि बनी है. दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM की चुनौती एक अलग है. यही वजह रही है कि सीमांचल के इलाके में महागठबंधन का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और एनडीए ने बाजी मार ली. यही वह क्षेत्र रहा जहां तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन ने खराब प्रदर्शन किया और एनडीए बिहार की सत्ता पर काबिज हो गया.
तेजस्वी यादव के सामने उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश साहनी, जीतन राम मांझी के बाहर निकल जाने के बाद अपने सहयोगियों को जोड़ने की एक बड़ी चुनौती होगी. देखना दिलचस्प है कि पार्टी को एकजुट रखने के साथ ही नए सहयोगियों को जोड़ पाते हैं अथवा नहीं.
तेजस्वी के सामने यह भी एक बड़ी चुनौती है कि वह दूसरे राज्यों में आ राजद का विस्तार करें. लालू की अनुपस्थिति में तेजस्वी के सामने एक बड़ा बहुत बड़ा वैक्यूम है और दूसरे राज्यों में पहले तो बिहार में ही मजबूत होने की स्थिति में आए हैं. अभी अब दूसरे राज्यों में खुद को स्थापित करने की एक बड़ी चुनौती होगी. नये कार्यकर्ताओं- नेताओं को जोड़ने की स्थिति तैयार करनी होगी और सहयोगियों की तलाश करनी जरूरी होगी.

