एमपी ; फिल्मी दुनिया में भले ही पात्र सिंघम का चोला पहनकर जनता के हित में कार्य करते दिखते हो और देशभक्ति जनसेवा का भाव प्रदर्शित करते नजर आते हो, पर आज के वास्तविक पात्रों के हाल बदहाल है. कहने का मतलब है कि रियल जिंदगी में थानेदार अपने रोल करने में फेल साबित हो रहे है. इन दिनों रीवा जिले के तराई अंचल में एक थानेदार महोदय सिंघम की खाल ओढ़कर भोली भाली जनता का खून चूस रहे है.
तराई अंचल के यह महाशय अपने थानाक्षेत्र में अवैध उत्खनन, अवैध व्यापार, अवैध कारोबार के साथ ही अपराधियों एवं नशेड़ियों की शरणस्थली बनाये हुए है. थानेदार साहब का रुतबा तो मानो किसी एसपी से कम नही. महाशय अपनी काली कमाई के जरिये पुलिस विभाग में अपनी खासी अच्छी पैठ बना चुके है. इसलिए थाना प्रभारी बनकर ही काम करते है. इनके बातचीत का तरीका मानो गुंडों मवालियों से कुछ कम नही लगता. जनता से ही काली कमाई करने वाले थाना प्रभारी का रहन सहन देखकर मानो बड़ो बड़ो के पसीने छूट जाए. हालांकि ऐसे थानेदार ज्यादा दिन चल पाते. क्योंकि काली कमाई का नतीजा भी काला ही होता है. जनाब अभी भी वक्त है ज्यादा हवा में मत उड़िये क्योंकि एक न एक दिन जमीन पर ही आना पड़ेगा. इसलिए आपके लिए एक कहावत है कि सौ सुनार की एक लोहार की.

