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विश्व आदिवासी दिवस: पारंपरिक अधिकार के लिए संकल्पित होने का दिवस

by bnnbharat.com
August 9, 2020
in समाचार
विश्व आदिवासी दिवस: पारंपरिक अधिकार के लिए संकल्पित होने का दिवस
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एंजलीन,

रांची: 9 अगस्त का दिन पूरी दुनिया के सभी आदिवासी समाज के लोगों के इस दिवस को अपनी भाषा – संस्कृति व स्वशाशन – परम्परा के संरक्षण के साथ-साथ जल  जंगल जमीन व खनिज के पारंपरिक अधिकार के लिए संकल्पबद्ध होने का दिवस है.

“हम आपके साथ हैं”…उक्त घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ ने 9 अगस्त 1994 को जेनेवा में दुनिया के सभी देशों से आये प्रतिनिधियों के प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस महासम्मलेन के समक्ष किया था. इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव एंटोनियो ग्युटेरेस ने साथ ही यह भी घोषणा की कि – “इस ऐतिहासिक अवसर पर हम आदिवासी समाज की आत्मनिर्भरता, स्वशासन, पारम्परिक भूमि क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधनों समेत उनके सभी अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा को पूरी तरह समझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं…”. इसी महासभा में व्यापक चर्चा के बाद दुनिया के सभी देशों को 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने का निर्देश दिया गया था. संयुक्त राष्ट्र संघ ने महसूस किया कि 21 वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में रहनेवाले आदिवासी समाज – भारी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा और न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के साथ-साथ बेरोज़गारी तथा बंधुआ मज़दूरी जैसे समयाओं से ग्रसित हैं. इन्हीं संदर्भों में उक्त सवालों के साथ–साथ आदिवासियों के मानवाधिकारों को लागू करने के लिए 1982 में विश्व स्तर पर यूएनडब्ल्यूजीईपी नामक विशेष कार्यदल का गठन किया गया. 3 जून 1992 को ब्राजील में आयोजित ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ के अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में विश्व के आदिवासियों की स्थिति की समीक्षा–चर्चा कर इसके लिए विशेष प्रस्ताव पारित किया. 1993 में यूएनडब्ल्यूजीईपी के 11वें अधिवेशन में प्रस्तुत आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र के प्रारूप को मान्यता मिलने पर 9 अगस्त 1994 को यूएनओ के जेनेवा महासभा में सर्वसम्मति से इसे पूरी दुनिया के देशों में लागू करने का फैसला निर्देशित किया गया. इसके बाद से ही प्रत्येक 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस ( इंटरनेशनल डे ऑफ द वर्ल्ड इंडिजिनस पीपुल) मनाया जाने लगा.

9 अगस्त का दिन पूरी दुनिया के सभी आदिवासी समाज के लोगों के इस दिवस को अपनी भाषा–संस्कृति व स्वशासन-परम्परा के संरक्षण और विकास के साथ-साथ जल–जंगल–ज़मीन व खनिज के पारंपरिक अधिकार के लिए संकल्पबद्ध होने का दिवस है. वहीं तथाकथित मुख्य धारा के लोगों के खुद से ये सवाल पूछने का भी दिन है कि क्या वास्तव में यूएनओ के निर्देशानुसार, हम आपके साथ है? क्योंकि तथ्य बतलाते हैं कि यूएनओ का एक प्रमुख सदस्य देश होने के बावजूद भारत की सभी सरकारों ने न तो इस दिवस की महत्ता के बारे में कभी देश के आम नागरिकों बताया और न ही इस देश आदिवासियों को अपने अधिकारों के लिए कभी जागरूक और प्रोत्साहित किया. सच तो यही है कि तमाम दावा–दलीलों के बावजूद भारत समेत अनेकों देशों के लोकतान्त्रिक शासन में आज भी आदिवासियों की हालत ‘दोयम दर्जे’ की बनी हुई है. हालाँकि आरक्षण से कुछ तात्कालिक लाभ तो लेकिन तथाकथित सभ्य समाज और शासन–प्रशासन में इनके प्रति हिकारत का भाव यथावत कायम है.

वर्षो पूर्व जब अंग्रेज इस देश को गुलाम बनाकर शासन करने आये तो यहाँ के आदिवासियों ने ही सबसे पहले सशत्र विरोध कर स्वतन्त्रता – संग्राम का बिगुल फूंका था. कुपित होकर अंग्रेजों व उनके इतिहासकारों ने इन आदिवासियों के बारे में ‘ बर्बर-हिंसक और असभ्य-जंगली ‘ कहने का दुष्प्रचार ऐसा स्थापित किया कि आज़ाद भारत में भी कमोबेस वही नज़रिया आज भी कायम है. तभी तो  आदिवासियों उसी संशय–भ्रम की निगाह से देखा–समझा जाता है. आज भी जब वे अपने अस्तित्व और अस्मिता पर मंडराते संकटों का सवाल उठाते हैं तो बिलकुल अंग्रेजी हुकूमत की भांति इन्हें कभी ‘विकास विरोधी’ तो कहीं नक्सली–माओवादी कहकर लांछित–प्रताड़ित किया जाता है. यही नहीं अब तो देश के संविधान प्रद्दत प्रावधानों अधिकारों को लागू करने की आवाज़ उठाने के प्रतिक के रूप में झारखण्ड के अपने गाँव में ही पत्थल गाड़ने मात्र पर इन्हें ‘देशद्रोही’ तक कहा जा रहा है . दुखद है कि उनके आस-पास जीने-रहनेवाले व्यापक समाज के लोग भी इस दुष्प्रचार व आरोप को सही मान कर इनके दमन–उत्पीडन पर मौन हैं. इनके पत्थलगड़ी करने का एकमात्र कारण है कि इनके बचे-खुचे जंगल इलाके सरकार द्वारा बड़े निजी घरानों को लूट की खुली छूट दी जा रही है .

अत्याधुनिक तेज औद्योगिक विकास के कमीशनखोरी के रथ पर सवार तथाकथित मुख्यधारा का कहलानेवाले सभ्य समाज के लोगों की लोलूप निगाहें इनके जल, जंगल ज़मीन और खनिज पर लगीं हुई हैं. और तो और झारखण्ड की राजधानी रांची समेत कई बड़े शहर जो कभी आदिवासी बाहुल्य घोषित थे, वहाँ आदिवासी अल्पसंख्यक हो गए हैं. क्योंकि छल–प्रपंच और सत्ता–शासन बल से सभ्य समाज सवारा यहाँ की सारी आदिवासी जमीनें हड़प लीं गयीं हैं. वर्तमान विकास से होनेवाले विनाश का दंश सामाजिक तौर पर यदि सबसे अधिक कोई झेल रहा है तो वो है आदिवासी समाज. जो आज अपने अस्तित्व के महासंकटों से निरंतर घिरते जा रहें हैं. गौरतलब है कि एक सामान्य समाज के लोगों के विस्थापित होने पर महज उनकी ज़मीन ही जाती है, लेकिन जब एक आदिवासी समाज कहीं से उजड़ता या विस्थापित होता है तो वर्षों से बसी बसायी उनकी भाषा–संस्कृति और परम्परा, हमेशा के लिए नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है. विरोध की आवाज़ उठाने पर शासन के लिए फ़ौरन कानून व्यवस्था और देश की एकता और अखण्डता के लिए गंभीर ख़तरा बन जाता. आज जबकि हर समाज और व्यक्ति अपने विकास लिए चाँद और मंगल की ऊँचाई छूना चाहता है, लेकिन सिर्फ एकमात्र आदिवासी समाज ही ऐसा है जो सिर्फ इतना चाहता है कि उसके अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों की गारंटी हो तथा उसके जीने–बढ़ने के लिए सामान अवसर हासिल हो. एक वास्तविक सभ्य और लोकतान्त्रिक समाज के नागरिक की हैसियत से हमारा दायित्व नहीं बनता है कि अपने ही देश–समाज के अभिन्न अंग, जिस आदिवासी समाज के अस्तित्व – अस्मिता और अधिकारों को सुनिश्चित करने का जो संकल्प संयुक्त राष्ट्र संघ ने लिया…हम भी संयुक्त राष्ट्र संघ के उस वैश्विक मानवीय संकल्प को आत्मसात करें.

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