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अंत समय में भी दानवीर बना रहा कर्ण : मैं अंग हूं – 16

by bnnbharat.com
July 30, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार, संस्कृति और विरासत
अंत समय में भी दानवीर बना रहा कर्ण : मैं अंग हूं – 16
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ईस बात को सभी जानते हैं कि जिस  महाभारत युद्ध को अपने शस्त्र और शौर्य के दम पर अंगराज कर्ण ने दो दिन आगे बढ़ाया था अर्थात 16 दिन में समाप्त हो जाने वाले ‘महाभारत’ को 18 दिनों तक चलने को मजबूर कर दिया था, अन्ततः वीरता का  प्रदर्शन और युद्ध भूमि के षडयंत्रों का मुकाबला करते हुए कर्ण को भी खून से लथपथ कुरुक्षेत्र की माटी पर ठीक उसी प्रकार धराशायी हो जाना पड़ा, जिस प्रकार श्री अन्य अनेक रथियों-महारथियों का अंत हुआ था। यह भी कि कर्ण के लहूलुहान अवस्था में धराशायी होते ही पांडव सेना ने विजय का जयघोष किया, जबकि कौरव खेमे में हाहाकार मचा गया।

लेकिन स्वयं पांचों पांडव भी जब अपनी । वीरता पर गर्व करते हुए जीत का बखान करने लगे तो कृष्ण ने उन्हें यह कहकर चुप कर दिया कि कर्ण की पराजय पांडवों की वीरता का नहीं, बल्कि एक साथ कुंती का अपने पांच पुत्रों का जीवन दान मांगने, इंद्र द्वारा प्रपंच से कर्ण का जन्मजात कवच कुंडल प्राप्त कर लेने, गुरु परशुराम का ब्रह्मास्त्र चलाते वक्त मंत्र भूल जाने का शाप, सारथी शल्य द्वारा युद्ध भूमि में कर्ण को बारम्बार हतोत्साहित करने और स्वयं उनकी (कृष्ण की) अपनी रणनीति का परिणाम है। इतने ‘सारे षडयंत्र अगर एक साथ नहीं किये गये होते तो कर्ण की पराजय मुश्किल नहीं, असंभव थी।

कृष्ण के उक्त रहस्योद्घाटन से पांडवों ने तो चुप्पी साध ली, मगर युद्ध भूमि में घायलावस्था में पड़े कर्ण की दानवीरता की अंतिम परीक्षा शायद अभी भी शेष थी। मरघट बने उस कुरुक्षेत्र में तभी एक ब्राह्मण ‘दानवीर-दानवीर’ की हांक लगाता किसी को ढूंढ़ता हुआ नजर आया। महाभारत कथा से ज्ञात होता है कि बुरी तरह से घायल और युद्धभूमि में अचेत पड़े कर्ण के कानों से जैसे ही ‘दानवीर’ की आवाज टकरायी, उसकी निरंतर खोती चेतना वापस लौटने लगी। रक्त धारा से ढकती आंखें खोलते ही सामने एक ब्राह्मण खड़ा दिखा, जो उससे दान की याचना कर रहा था। लेकिन अब उस घायल दानवीर के पास दान को कुछ नहीं बचा था। जो कुछ शेष बचा था, वह था रक्त रंजित शरीर और निरंतर मद्धिम होती सांस। बावजूद इसके वह सोच रहा था, कहीं यह परीक्षा तो नहीं ? उसकी दानवीरता को संदिग्ध बना डालने की कोई साजिश तो नहीं? तभी उसे अपने स्वर्ण दंत की याद आई।

निराशा में डूबी आंखें चमक उठीं। युद्ध भूमि में ही खड़े अपने पुत्र चित्रसेन को उसने एक पत्थर लाकर मुख पर प्रहार कर स्वर्ण दंत तोड़ डालने की आज्ञा दी, जिस पर लगे खून को अपने अश्रु-जल से धोकर दान देने लायक बनाया और ब्राह्मण की हथेली पर रख दिया। ब्राह्मण तो दान लेकर चला गया, मगर दोहरी पीड़ा से आहत कर्ण की संज्ञा शून्यता शीघ्रता से बढ़ने लगी। तभी आ गये सामने कृष्ण मुंदती आंखें फिर से खुल गई। कर्ण से अंतिम इच्छा पूछी। जवाब मिला ‘आप स्वयं मेरा अंतिम संस्कार करें, लेकिन चिता कुंवारी भूमि पर सजे। ऐसी भूमि’ जहां कभी एक तृण तक न उगा हो। कृष्ण के ‘एवमस्तु’ कहते ही उस महावीर ने इस नश्वर जगत से नाता तोड़ लिया।

क्रमश:…

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