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कृष्ण की हथेली पर सजी थी कर्ण की चिता : मै अंग हूं – 17

by bnnbharat.com
July 31, 2021
in भाषा और साहित्य, समाचार, संस्कृति और विरासत
कृष्ण की हथेली पर सजी थी कर्ण की चिता : मै अंग हूं – 17
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कर्ण की इहलीला खत्म हो चुकी थी। बच गये थे कृष्ण, जिन्हें कर्ण की अंतिम इच्छा पूरी करनी थी। कुंवारी भूमि पर चिता सजाकर। मगर, कहां मिलेगी ऐसी भूमि ? कृष्ण के समक्ष एक चुनौती भरा प्रश्न ! कहते हैं, कि दिव्य दृष्टि डालने पर कृष्ण को वैसी भूमि भी दानवीर की ही अंगभूमि पर बहने वाली चांदन नदी के मध्य वहां दिखी, जहां रजोगुण और तमोगुण पहले से विद्यमान थे। नहीं था तो सतोगुण, जो कर्ण की चिता सजने के बाद वहां स्थापित हो जाने वाला था, यानी जो भूमि अब तक एक ‘गुण’ से विमुख थी, अब तीनों ‘गुणों’ का संगमस्थल बन जाने वाली थी।

अंग भूमि, चांदन नदी, भगवान कृष्ण और दानवीर कर्ण से जुड़ी यह किंवदंती तभी से यहां प्रचलित हुई। कहा तो यह भी जाता है कि कर्ण को दिये गये वरदान में कोई खोट न रह जाय, इसलिए कृष्ण ने विराट रूप धारण कर कर्ण की चिता अपनी हथेली पर सजायी। चांदन के मध्य रेत का वह हथेलीनुमा टापू आज भी खड़ा है, जो लोक मानस में कृष्ण की हथेली के रूप में मान्य है। क्षेत्र में प्रचलित इस मान्यता को सजीव करने के लिये स्थानीय लोगों ने उस चिता भूमि के दक्षिणी छोर पर कृष्ण की एक प्रस्तर प्रतिमा भी स्थापित कर दी है, जिसकी हथेली पर कर्ण लेटा हुआ है। कर्ण की चिता भूमि के रूप में यह स्थल कब से चर्चित हुआ और इस लोक मान्यता ने कब आकर ग्रहण किया, इसका सही जवाब किसी के पास नहीं है। हां, यह आस्था दिनों दिन मजबूत जरूर होती चली जा रही है, जिसकी वजह कर्ण की चिता भूमि के रूप में मान्य स्वयं वह स्थल और उसकी हथेलीनुमा बनावट है।

आम दिनों की बात छोड़ दें तो हर साल बरसात में चांदन पूरे वेग में उफनती है। कभी-कभी तो उसका प्रलयकारी फैलाव दर्जनों गांवों तक को अपनी चपेट में ले लेता है। लेकिन यह देखकर आश्चर्य होता है कि नदी जब अपने दोनों किनारों को लांघकर जिधर-तिधर बह चलने को उद्यत हो जाती है, तब भी नदी के मध्य स्थित वह रेतीला भूखंड जस का तस सुरक्षित रह जाता है। चांदन की वेगवती धारा उसका सम्मान करती हुई वहां दो हिस्सों में बंटकर बहने लगती है। यहीं नहीं, उस हथेलीनुमा टापू का प्रक्षालन करती हुई चंद कदम आगे बढ़ते ही उसकी दोनों विभाजित धाराएं पुनः एकाएक हो जाती हैं।

बहरहाल, कर्ण की इस चिताभूमि से जुड़ी इस मान्यता के निरंतर मजबूत होते चले जाने की एक अहम वजह यह प्रत्यक्ष साक्ष्य भी है, जो न चाहते हुए भी इस प्रचलित मान्यता को सच रूप में स्वीकार कर लेने को विवश करता है। ज्येष्ठ गौरनाथ और शक्ति की पूजा अर्चना के साथ-साथ नदी के बीच स्थित उस चिता भूमि को देखने और नमन करने वाले श्रद्धालुओं का तांता वहां नित्य लगा रहा है।

क्रमशः…

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