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जियोलॉजिस्ट पीएन बोस की ओर से 24 फरवरी 1904 को टाटा को लिखा गया पत्र ने देश के औद्योगिकीकरण की दिशा बदल दी

by bnnbharat.com
February 23, 2021
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जियोलॉजिस्ट पीएन बोस की ओर से 24 फरवरी 1904 को टाटा को लिखा गया पत्र ने देश के औद्योगिकीकरण की दिशा बदल दी
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जमशेदजी नसेरवाजी टाटा ने 1882 में महाराष्ट्र के चंदा जिले में स्टील प्लांट स्थापित करने की बना ली थी योजना

 रांची:- 1880 के दशक में जमशेदजी नसेरवानजी टाटा ने महाराष्ट्र के चंदा जिले (अब चंद्रपुर) जिले के लोहारा में इस्पात संयंत्र स्थापित करने की कार्ययोजना पर काम शुरू कर दिया था, लेकिन 24 फरवरी 1904 को देश के प्रसिद्ध जियोलॉजिस्ट प्रमथ नाथ बोस की ओर से लिखा एक पत्र ने देश के औद्योगिकीकरण की दिशा बदल कर रख दी. यदि जियोलॉजिस्ट पीएन बोस ने जमशेदजी को यह पत्र नहीं लिखा होता, तो शायद टाटा स्टील का अस्तित्व आज झारखंड में ना होता.

जमशेदजी नसेरवानजी टाटा ने 1882 में “चंदा जिले में लौह-कार्य की वित्तीय संभावनाओं पर रिपोर्ट (रिपोर्ट ऑन द फाइनांशियल प्रॉस्पेक्ट्स ऑफ आयरन-वर्किंग इन द चंदा डिटस्ट्रिक्ट)“ नामक वॉन श्वार्ज़ की रिपोर्ट देखी, जिसमें कहा गया था कि चंदा जिले में लौह अयस्क का सबसे अच्छा भंडार लोहारा में था. पास में ही स्थित वरोरा में कोयला है. लेकिन कोयले के परीक्षण के बाद, यह अनुपयुक्त पाया गया. 24 फरवरी, 1904 को जमशेदजी को प्रमथ नाथ बोस का एक पत्र मिला, जिसमें मयूरभंज जिले के गोरुमहिसानी की पहाड़ियों में लोहे के अकूत भंडार होने की बात कही गयी थी. इसने झरिया में कोयले की उपलब्धता के बारे में भी बताया. लगभग इसी समय, सर दोराबजी टाटा 140 मील की दूरी पर नागपुर के पास धौली और राजहारा हिल्स में एक प्लांट स्थापित करने का निर्णय ले चुके थे.  सर दोराबजी टाटा द्वारा एक सर्वेक्षण टीम का गठन किया गया, जिसका नेतृत्व सी. एम. वेल्ड ने किया. यह अन्वेषण सार्थक साबित हुआ. 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड (टिस्को) की स्थापना मयूरभंज से थोड़ी दूर साकची गाँव के पास दो नदियों ‘सुवर्णरेखा’ और ’खरकई’ के संगम पर की गई थी, जो बंगाल-नागपुर रेलवे लाइन के करीब भी था.

भारत में लोहे की ताकत की पूरी कहानी

भारत को लोहे की ताकत देने वाली पूरी कहानी से पहले लौह उद्योग की शुरुआत दिनों की मुश्किलों को समझना भी जरुरी क्योंकि इसी आधार पर हम जमशेदजी टाटा की मेहनत और दूरदर्शिता का एहसास कर सकते हैं .जमशेदजी ने नागपुर जर्मन एक्सपर्ट रिटर वॉन स्वार्ज द्वारा तैयार रिपोर्ट के आधार पर चंदा जिला जो आज के महाराष्ट्र जिले चंद्रपुर का पुराना नाम है , उसे क्षेत्र में इस्पात संयंत्र स्थापित करने का मन बना लिया. जमशेदजी टाटा के दिमाग में जैसे लोहे ने अपना घर बना लिया हो वो रात दिन फैक्टरी के बारे में सपने देखने लगे . ना सिर्फ सपना बल्कि जहां भी उनको लोहे की जानकारी मिलती थी वो उसे पढ़ते, चर्चा करते समझने की. कोशिश करते की कैसे सफल हुआ जा सकता है . उनके दिमाग में लगातार प्लानिंग चल रही थी . उन्होंने सेंट्रल प्रॉविंस में ’लोहारा’ नाम की कई जगहों का दौरा भी किया . इस दौरान जमशेदजी ने कई बार विदेश का भी दौरा किया. विदेश दौरे से भारत लौटने पर जमशेदजी टाटा ने सेंट्रल प्रॉविंस के कमीश्नर सर जॉन हेनरी मॉरिस से मुलाकात की और चंदा(चंद्रपुर) जिले के ’लोहारा’ में आयरन फैक्टरी लगाने का प्रस्ताव रखा, टाटा के इस प्रस्ताव से कमीश्नर सर जॉन हेनरी मॉरिस के तो मानों होश उड़ गए, उन्हें यकीन ही नहीं हुआ की कोई ऐसा भी सोच सकता है . लेकिन टाटा पूरी योजना के साथ आए थे, उन्होंने वरोरा कोल ब्लॉक और लोहारा में लौह अयस्क की खानों का जिक्र करते हुए वर्धा से वरोरा तक रेलवे लाइन तक का प्रस्ताव रखा , लेकिन उस वक्त अंग्रेजी अधिकारी भारतीय को शक के नजरिए से देखा करते थे, खासतौर से निजी क्षेत्र में निवेश से तो उन लोगों की शंका और बढ़ जाती थी इसीलिए प्रस्ताव हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में चला गया . लेकिन टाटा का सपना मरा नहीं. उन्होंने 20 साल और इंतजार किया . साल 1899 में लॉर्ड कर्जन में भारत में माइनिंग पॉलिसी में बड़ा परिर्वतन किया. कई सुधार किए गए, सरकार ने कई तरह की रियायतें भी दी . इन दशकों में जमशेदजी टाटा की नजर से लोहे से जुड़ी कोई भी जानकारी जो छपी हो बच नहीं सकी . इस खबर ने तो जैसे उनके सपनों को पर लगा दिए.

इसके बावजूद जमशेदजी को सफलता नहीं मिली, लोहे की फैक्टरी का सपना लिए टाटा इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका का दौरा करते रहे . 1902 के आखिरी महीने दिसंबर के शुरुआती दिनों में वो हिन्दुस्तान वापस लौटे . इन दिनों जमशेदजी की सेहत भी खराब रहने लगी थी . इस दौरान चंदा जिले के प्रोजेक्ट का काम भतीजे शापुरजी सकलटवाला देख रहे थे . चंदा और लोहारा प्रोजेक्ट में जमशेदजी के बेटे दोराबजी टाटा और भतीजे शापुरजी ने बड़ी मेहनत की, जंगलों के खाक छाने, बैलगाड़ी में रात बीताई मगर कामयाबी हासिल नहीं हुई, प्लांट लगाने में कई तरह की तकनीकी दिक्कतें आने लगी तो आखिरकार थक कर टाटा ने चंदा प्रोजेक्ट का लाइसेंस सरेंडर कर दिया. सरेंडर करने के दौरान जब दोराबजी नागपुर गए तो उनकी नजर म्यूजियम में जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के मैप पर पड़ी पर जिसमें दुर्ग में लोह के खानें होने का जिक्र था . उम्मीद फिर जगी , अब दुर्ग और जबलपुर की ओर टाटा के सपनों को पूरा करने के लिए रुख किया गया . मगर यहां भी कामयाबी नहीं मिली . इसी दौरान टाटा को फिर एक मयूरभंज के महाराजा के पास से चिट्ठी आई. ये चिट्ठी लिखी थी पीएन बोस ने जिन्होंने जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के लिए मैप तैयार किया था. महाराजा ने ओडिशा में लोहे की खान का जिक्र किया और टाटा से यहां काम शुरु करने का प्रस्ताव रखा. इसी दौरान काम शुरु भी सरायकेला के खरसावां इलाके के सिनी में कैंप लगाना शुरु हुआ, प्रोजेक्ट इंजीनियर एक्सेल साहलिन अमेरिका से भारत पहुंचे तो जानकर हैरानी हुई की प्रोजेक्ट का स्थान सिनी से बदलकर साकची कर दिया गया. वजह बताई गई की सिनी में जमीन की दिक्कते हैं और पानी की भी कमी है . साकची वही जगह है जहां आज का टाटा स्टील प्लांट है. साकची गांव कालामाटी स्टेशन से 20 किलोमीटर दूर था. कालामाटी स्टेशन बंगाल-नागपुर स्टेशन के अंतर्गत आता था . प्लांट के लिए साकची का चुनाव भी एक संयोग ही ही था, रेलवे के सर्वेक्षण के दौरान साकची में भी प्लांट लगाने की बात सूझी. साकची के नजदीकी स्टेशन कालामाटी से कोलकाता की दूरी 152 मिल पड़ती थी जबकि सिनी से कोलकाता की दूरी 171 मिल. साथ ही साकची और गोरुमहिसनी (यहां पर लौह अयस्क खी खाने थीं) की दूरी कम थी . इतना ही नही खरकई और सुवर्णरेखा नदी भी पास में ही बहती थी और उस वक्त ये मशहूर था की किसी ने आज तक इन दोनों नदियों को सूखते हुए नहीं देखा. प्रोजेक्ट इंजीनियर साहलीन ने साकची को बेहतर जगह बताया और बिना देरी किए काम शुरु करने की बात कही. 27 फरवरी 1908 को काम शुरु हुआ और फावड़ा पड़ते ही जैसे किस्मत खुल गई. यहां हर वो चीज मिल रही थी जो प्लांट के लिए जरुरी पड़ने वाली थी . 1908 में काम शुरु हुआ तो डैम बने, रहने वालों के लिए क्वार्टर बनने लगे और 2 दिसंबर 1911 में टाटा स्टील एंड आयरन कंपनी ने पहला लोहा तैयार किया. 2 दिसंबर 1911 जश्न का दिन था मगर अफसोस इस बात का जिस लोहे का सपना जमशेदजी टाटा ने 40 सालों से हर दिन देखा वो कभी साकची आ भी नहीं सके . उनकी निधन 1904 में हो चुका था लेकिन मौत से पहले उन्होंने अपने परिवार और बेटे दोराबजी टाटा को ये सीख जरुर दे दी की कभी लोहे के सपने को छोड़ना नहीं, काम जारी रहना चाहिए चाहे इसके लिए कितनी भी कीमत चुकानी पड़े.

वायसराय भी रह गये आश्चर्यचकित

2 जनवरी 1919 को भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने टाटा स्टील की प्लांट का दौरा किया, साकची शहर देखने आए थे, कोलकाता से उनके लिए विशेष ट्रेन चलाई गई थी. एक समारोह में उन्होंने साकची को जमशेदपुर नाम दिया . अपने भाषण में चेम्सफोर्ड ने कहा ’’ ये विश्वास करना मुश्किल है कि आज से 10 साल पहले यहां जंगल और झाड़ियां ही मौजूद थीं, आज यहां फैक्टरियां हैं, वर्कशॉप हैं और करीब 45 से 50 हजार की आबादी रहती है . ये सब इसलिए हुआ क्योंकि इसके पीछे जमशेद जी नसेरवानजी टाटा की महान शख्सियत की सोच, कल्पना थी.

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