बीएनएन डेस्कः पिछले साल माउंट एवरेस्ट की चोटी के पास बर्फ में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण) का पाया जाना किसी खतरे की घंटी है. दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट के सौ मीटर के दायरे में 27,500 फीट पर स्थित बालकनी नामक स्थान पर टाइनी प्लास्टिक फाइबर पाया गया था.
वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर की ओर से पिछले साल किए गए एक अध्ययन के मुताबिक एक व्यक्ति ने पिछले साल 5 ग्राम प्लास्टिक कन्ज्यूम किया, जो क्रेडिट कार्ड के प्लास्टिक के बराबर है. एनवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि मनुष्य एक साल में 39,000 से 52,000 माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स कन्ज्यूम करता है.
कई अध्ययनों से यह भी मालूम चला है कि माइक्रोप्लास्टिक्स, टॉक्सिक केमिकल तैयार करते हैं जो मोटापा, डायबिटीज और अलग-अलग तरह के कैंसर की वजह बन सकते हैं. जैसे-जैसे प्लास्टिक से संबंधित समस्याएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे प्लास्टिक जीवन का अभिन्न अंग बनता ही चला जा रहा है. इसका जल्द से जल्द समाधान ढूंढा जाना जरूरी है क्योंकि अगर इसका समाधान समय पर नहीं ढूंढा गया तो यह बड़ी परेशानी की वजह बन सकता है.
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के लिए सबसे नेचुरल रिस्पॉन्स रीसाइक्लिंग है. हालांकि रीसाइक्लिंग प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाने या इससे पैदा होने वाली परेशानियों से निपटने का कोई परमानेंट सॉल्यूशन नहीं है. मगर कुछ हद तक रीसाइक्लिंग माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को रोक सकती है, इसलिए यह फिलहाल के लिए एक स्मार्ट सॉल्यूशन है. रीसाइकल्ड सामान का इस्तेमाल करना हरियाली और बेहतर जीवन को सुनिश्चित करेगा.
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए यह सबसे जरूरी है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगे. प्लास्टिक इस्तेमाल पर रोक प्रदूषण रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है.
सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को विनियमित करने से लेकर सही वेस्ट मैनेजमेंट सुनिश्चित करने तक कई कदम सरकार और स्थानीय निकायों की ओर से माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए उठाए जा सकते हैं. भारत 1964 की तुलना में आज 20 गुना ज्यादा प्लास्टिक का उत्पादन कर रहा है. यह खतरे की घंटी है, इसको लेकर तुरंत जरूरी कदम उठाए जाने जरूरी हैं अन्यथा मौजूदा स्थिति और ज्यादा विकराल रूप ले सकती है.
हालांकि लोग व्यक्तिगत स्तर पर भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए जरूरी कदम उठा सकते हैं. जैसे- जीरो-वेस्ट ट्रिप जैसी व्यक्तिगत पहल करना, अपने बर्तनों का इस्तेमाल करना, बोतल पानी के इस्तेमाल को खत्म करना और प्लास्टिक की पैकेजिंग का त्याग करना, प्लास्टिक का इस्तेमाल न करना इत्यादि.

