रांची: आर्थिक जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड-19 महामारी के फैलाव के फलस्वरूप देश में लागू लॉकडाउन से बिगड़ती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए आरबीआई द्वारा की गयी पहलों में नेकनीयती तो दिखती है, परंतु आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास की घोषणाओं में कई संकोच और मजबूरियां भी झलकती हैं.
आर्थिक मामलों के जानकार सूर्यकांत शुक्ला ने बताया कि सिस्टम में लिक्विडिटी की पर्याप्त उपलब्धता के लिए रिवर्स रेपो रेट को 4 प्रतिशत से घटाकर 3.75 प्रतिशत किया गया है. कमर्शियल बैंक अपनी अतिरिक्त कैश को आरबीआई में जमा कर देते है और रिवर्स रेपो रेट के हिसाब से ब्याज पाते हैं.
इस कदम से आरबीआई यह मान रही है कि बैंक अब अपना अतिरिक्त कैश आरबीआई में जमा नहीं करेंगे और इसे व्यापारियों को कर्ज देने में लगाएंगे परंतु बैंक जोखिम से डर से, बैड लोन के बोझ के डर से और उनके निर्णय के रिव्यु में जाने के डर से जोखिम नहीं उठाते तथा लोने से कतराते है. रेगुलेटर के रूप में आरबीआई को यह सब डर दूर करने के लिए साहसिक होना चाहिए था.
इसी तरह से लक्षित दीर्घकालीन रेपो परिचालन यानी टेल्टो-2 और नाबार्ड, सिडबी तथा हाउंसिंग फाइनेंस कंपनीज के लिए लिक्विडिटी उपलब्ध कराने के निर्णय से निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा,क्योंकि टेल्ट्रो-1 से पब्लिक सेक्टर और बड़े कॉरपोरेशन को फायदा मिला, इसलिए नॉन बैंकिंग और माइक्रो फाइनेंस इंटीट्यूशन्स के लिए यह दूसरा दौर जरुरी था,जिससे, छोटे बिजनेस को लाभ मिल सकेगा.
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वेज एंड मीन्स एडवांस वह सस्ती ऋण सुविधा है, जो आरबीआई राज्य सरकार को देती है. राजस्व आय की कमजोरी और भुगतान की जरुरत के असंतुलन से जूझ रहे राज्यों के लिए आरबीआई की घोषणा से बहुत राहत मिलेगी,क्योंकि अब पहले से 30 प्रतिशत ज्यादा और बढ़ी हुई अवधि के लिए उपयोग में लायी जा सकेगी. यह एक अच्छी पहल है. परंतु यहां डब्ल्यूएमए की सुविधा बढ़ाने के बजाय आरबीआई को साहसिक होकर राज्यों के बांड स्वयं खरीदने का फैसला लिया जाता और बाद में सेकेंडरी मार्केट में जाते, तो राज्यों के लिए ज्यादा अच्छा होता, परंतु यहां पर साहस की कमी झलकी है.
एक और घोषणा की चर्चा यहां करना मुनासिब होगा, जिससे लिक्विडिटी कवरेज रेश्यो को 100 प्रतिशत से घटाकर 80 प्रतिशत किया गया है. जिसे दो चरणों में वापस लिया जाएगा. एलसीआर एक टूल है, बैंकिंग व्यवस्था में जिसमें बैंक को अगले 30 दिनों के लिए जरूरी कैश भुगतान की राशि को रिजर्व के तौर पर रखना होता है,इसमें आंशिक कमी की गयी है. ये कमी नाम मात्र की है, जबकि हम सभी जानते है कि कैश रिजर्व रेश्यो और स्टटूटोरी लिक्विड रेश्यो,एसएलआर के रूप में बैंक निर्धारित राशि को रिजर्व के तौर पर रखते ही है, तब एलसीआर में इतनी मामूली कटौती का बैंकों की तरलता बढ़ाने में कितना बड़ा फायदा मिल पाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा.
एक उदाहरण के तौर पर सिडबी के लिए जो राशि मार्क की गयी है, वह मात्र 15हजार करोड़ रुपये है, जबकि सिडबी में माइक्रो, स्मॉल और मध्यम श्रेणी के उद्योग आते है. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आरबीआई के प्रयास सराहे जाने चाहिए, परंतु गवर्नर शक्तिकांत दास को संकोच छोड़कर साहसिक फैसले लेने से इकॉनमी को ज्यादा गति मिलेगी.

