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हैंडसम हंक से संन्यासी तक- विनोद खन्ना

2018 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.

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बॉलीवुड के हैंडसम हीरो से लेकर ओशो के आश्रम में स्वामी बनने तक, और पॉलिटिक्स में सफलता हासिल करने से लेकर कैंसर से जंग हारने तक, हिंदी सिनेमा के बेहतरीन एक्टर्स में से एक विनोद खन्ना ने जिंदगी का हर रंग देखा. 2017 में दुनिया को अलविदा कह चुके विनोद खन्ना का आज 73वां जन्मदिन है. विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर में हुआ था. उनका परिवार अगले साल 1947 में हुए विभाजन के बाद पेशावर से मुंबई आ गया था. उनके माता-पिता का नाम कमला और किशनचंद खन्ना था. विनोद खन्ना अपने फ़िल्मी सफर की शुरूआत 1968 मे आई फिल्म “मन का मीत” से की जिसमें उन्होने खलनायक की भूमिका अदा की .

विनोद खन्ना की हिट फिल्में-

विनोद ने अपने फिल्मी करियर में लगभग 140 फिल्में कीं। आईए बताते हैं आपको उनकी बेहतरीन फिलमों के बारे में. ‘मेरे अपने’, गुलजार के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘मेरे अपने’, विनोद खन्ना की बेस्ट फिल्मों में से एक है. 1971 वो साल बना जब विनोद खन्ना की एक साल में सबसे ज्यादा 12 फिल्में रीलीज हुईं, इनमें ‘मेरा गांव मेरा देश’ प्रमुख है, इसमें विनोद विलेन की भूमिका में थे. परेश मेहरा के डायरेक्शन में बनी ‘हेरा फेरी’ फिल्म 1976 में रिलीज हुई थी. फिल्म में अजय और विजय की शानदार केमिस्ट्री देखने को मिली. अजय के रोल फिल्म में विनोद खन्ना ने और विजय के रोल में अमिताभ बच्चन बखूबी फिट हुए. इसके अलवा ‘परवरिश’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘मुकक्दर का सिकंदर’, और ‘दयावान’ सभी विनोद की शानदार फिल्में हैं.

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विनोद खन्ना और अमिताभ बच्चन-

70 के दशक में अपना बॉलीवुड करियर शुरू करने वाले विनोद खन्ना उन एक्टर्स में गिने जाते हैं जिन्होंने अमिताभ बच्चन को कड़ी टक्कर दी. विनोद खन्ना और अमिताभ बच्चन ने एकसाथ 10 फिल्मों में काम किया. दोनों पहली बार फिल्म ‘रेश्मा और शेरा’ में एक साथ नजर .


ओशो से प्रभावित होकर संन्यासी बने गये थे विनोद-

70 के दशक में विनोद खन्ना ओशो से प्रभावित हुए और अचानक ही उन्होनें बॉलीवुड को अलविदा कह दिया उनके इस तरह संन्यास लेने का फैसला सबको चौंका गया. विनोद महरून रंग का चोला और ओशो की तस्वीर वाली मनकों की माला पहनकर प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचे थे जो उन्होनें खास तौर पर इस ऐलान के लिए बुलाई थी.

विनोद खन्ना की दूसरी पारी-

1985 में विनोद अमेरिका के ओशो वाले आश्रम से वापस लौट आए, और बॉलीवुड में अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की, हालांकि इस बीच वो राजनीति की ओर मुड़ गये, 1997 में गुरदासपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और अटल सरकार में पर्यटन राज्यमंत्री बने. फिल्मों में अपने योगदान के लिए उन्हें 2018 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.

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