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‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’

पाकिस्तानियों को खदेड़ते हुए शहीद हुए थे गणेश, मां को अब भी है वादा पूरा होने का इंतजार

by bnnbharat.com
July 26, 2020
in Uncategorized
‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’
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रांची: साल दर साल बीतते चले गए. सरकारें आई और चली गईं. राज बदला-काज बदला, लेकिन अबतक नहीं पूरे हुए कारगिल शहीद के परिजनों से किए गए वादे. जी हां! पूरा देश विजय दिवस के अवसर पर कारगिल शहीदों को याद कर रहा है. उन्ही शहीदों में 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने घुसपैठी पाकिस्तान को कारगिल से खदेड़ कर ऑपरेशन विजय को पूर्ण किया था. इस युद्ध में भारत के 527 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे. इनमें से एक थे शहीद नायक गणेश प्रसाद यादव जो बिहार की राजधानी पटना के बिहटा प्रखंड के पांडेचक के रहने वाले थे.

बता दें कि कारगिल युद्ध के दौरान 29 मई 1999 को बटालिक सेक्टर के प्वाइंट 4268 पर चार्ली कंपनी की अगुआई कर रहे पटना जिले के बिहटा प्रखण्ड के पाण्डेयचक गांव के लाल, नायक गणेश यादव ने हंसते-हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी थी. ऑपरेशन विजय के दौरान उनके पराक्रम और बुलंद हौसलों के लिए सेना ने उन्हें वीरचक्र से नवाजा भी था. इस शहादत के 21 साल गुजरने को है, लेकिन अपने ही घर में सरकार ने शहीद को सम्मान नहीं दिया.

30 जनवरी 1971 को बिहटा के पाण्डेयचक गांव निवासी रामदेव यादव व बचिया देवी के घर गणेश यादव का जन्म हुआ था. शहीद नायक गणेश प्रसाद यादव को बचपन से सेना में जाने का मन था. तभी तो मैट्रिक का परीक्षा देने के बाद ही सेना में भर्ती हुए और बिहार रेजिमेंट से वह कारगिल के बटालिक सब सेक्टर तैनात थे उनकी शादी 1994 में पुष्पा राय से हुई थी.

शादी के बाद उनके दो बच्चे थे अभिषेक और ज्योति जो इन दिनों अभिषेक सैनिक स्कूल से पढ़कर बीकॉम कर चुका है तो बेटी फैशन डिजाइनिंग का पढ़ाई कर रही है. शहीद के अंतिम दर्शनों को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी पहुंचे थे. गांव की बदहाली को देखते हुए घोषणाओं की झड़ी लगा दी. इनमें शहीद के नाम पर गांव तक जाने के लिए पक्की सड़क, अस्पताल एवं स्कूल सबसे अहम था.

इससे पूरे क्षेत्र के लोग भी सरकार से प्रभावित व उत्साहित हुए. सरकार ने अपने खर्चे से स्कूल का भवन बना दिया. लेकिन, आज तक उसे प्राथमिक विद्यालय का दर्जा नहीं मिला. जिससे अब भी उसमें एक अदद शिक्षक का इंतजार है. सरकार की उपेक्षा के कारण ग्रामीणों की मेहनत तबेले में तब्दील हो गयी है.

दूसरी घोषणा अस्पताल की थी. लेकिन, आश्चर्य की बात है की 21 साल बाद भी एक रुई व सुई भी लोगों के लिए नहीं पहुंचा. सड़क की हालत भी बद से बदतर बनी हुई है. शहीद के नाम पर सामुदायिक भवन की नींव भी पड़ी, लेकिन आज तक काम नहीं पूरा हो सका. इसके चलते चारा रखने का गोदाम बन कर रह गया है.

कारगिल दिवस के मौके पर एक सरकारी कैलेंडर की तरह गणेश को याद करके उसके बाद गांव को भुला दिया जाता है यहां तक उस दिन कई मंत्री से लेकर सांसद तक भी आते हैं स्थानीय विधायक को भी कई बार इन समस्या से अवगत हो चुके हैं लेकिन अभी तक शहीद का परिवार या उनके गांव का विकास पूरा नहीं हो सका.

शहीद की मां बचिया देवी बताती है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव उनके घर पर आए थे और कई वादे भी किए लेकिन आज भी वादे आधे अधूरे ही रह गए हैं यहां तक कि ना घर बना ना ही कोई सुविधा . जो राज्य की सरकार उस समय शहीद को लेकर कई घोषणाएं किए लेकिन घोषणा केवल खोखले साबित हुए ना सरकारी नौकरी मिली और ना ही कोई सरकारी सुविधा यहां तक कि घर भी टूटा फूटा है सरकार ने बोला था कि घर बना कर देंगे लेकिन सब झूठ निकला.

आपको बता दें कि शहादत के समय उस वक्त भारत सरकार की तरफ से शहीद परिवार को 15 लाख के साथ गैस एजेंसी आवंटित किया गया था और राज्य सरकार की तरफ से 10 लाख मिले थे. साथ ही साथ राज्य सरकार की तरफ से कई वादे भी किए गए थे लेकिन अब तक पूरा ना हो सका. हालांकि उस समय के राजद पार्टी से सांसद एवं वर्तमान बीजेपी सांसद रामकृपाल यादव ने अपने तरफ से बिहटा के लई चौक पर शहीद नायक गणेश प्रसाद यादव का स्मारक बनवाया था जो आज भी है लेकिन देखभाल करने वाला कोई नहीं है. केवल कारगिल विजय दिवस के दिन या अन्य सरकारी कैलेंडर की तरह स्मारक पर नेता, मंत्री या सांसद पहुंचते हैं और माल्यार्पण कर चले जाते हैं. शहीद परिवार आज भी सरकार से मदद की गुहार लगाती है.

 

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