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1989 में कर्नाटक की बोम्मई सरकार बिना फ्लोर टेस्ट के ही बर्खास्त कर दी गई थी

by bnnbharat.com
March 17, 2020
in समाचार
1989 में कर्नाटक की बोम्मई सरकार बिना फ्लोर टेस्ट के ही बर्खास्त कर दी गई थी

IMAGE CREDIT DAINIK BHASKAR

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बोम्मई सरकार गिरने के 5 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट जरूरी किया

नई दिल्ली: वर्तमान परिपेक्ष में फ्लोर टेस्ट शब्द काफी चर्चा में रहा है अक्सर सुनने में अत हे की अमुख राज्य में सर्कार का फ्लोर टेस्ट होगा. जब भी किसी सरकार पर बहुमत का संकट आता है, तो उसे भी फ्लोर टेस्ट से गुजरना ही पड़ता है।इसका अभी सबसे ताज़ा उदाहरण मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार है.

पहली बार ऐसा 1989 में हुआ था

कर्नाटक में 1985 में 8वीं विधानसभा के लिए चुनाव में जनता पार्टी ने राज्य की 224 में से 139 सीटें जीतीं. कांग्रेस 65 ही जीत सकी.  जनता पार्टी की सरकार बनी.  मुख्यमंत्री बने रामकृष्ण हेगड़े, लेकिन हेगड़े पर फोन टैपिंग के आरोप में 10 अगस्त 1988 को इस्तीफा दे दिया.

इसके बाद मुख्यमंत्री बने एसआर बोम्मई, लेकिन कुछ ही महीनों में यानी अप्रैल 1989 में उनकी सरकार को भी कर्नाटक के तत्कालीन के राज्यपाल पी वेंकटसुब्बैया ने “बोम्मई के पास बहुमत नहीं था” कारण बता क्र बर्खास्त कर दिया. बोम्मई के बहुमत के दावे को ख़ारिज क्र दिया गया था.

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मामला 5 साल तक सुप्रीम कोर्ट में चला

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. 5 सालों तक सुनवाई चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया और कहा कि फ्लोर टेस्ट ही एकमात्र ऐसा तरीका है, जिससे बहुमत साबित हो सकता है. उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘जहां भी ये संदेह पैदा हो कि सरकार या मंत्रिपरिषद ने सदन का विश्वास खो दिया है, तो वहां परीक्षण ही एकमात्र तरीका है- सदन के पटल पर बहुमत हासिल करना’

1994 के फैसले के 23 साल बाद यानी 2017 में गोवा से जुड़े एक मामले में फ्लोर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक और टिप्पणी की, ‘फ्लोर टेस्ट से सारी शंकाएं दूर हो जाएंगी और इसका जो नतीजा आएगा, उससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी विश्वसनीयता मिल जाएगी’

फ्लोर टेस्ट दो तरह के होते हैं

सामान्य फ्लोर टेस्ट

जब भी कोई पार्टी या गठबंधन का नेता मुख्यमंत्री बनता है, तो उसे सदन में बहुमत साबित करना होता है. इसके अलावा अगर सरकार पर कोई संकट आ जाए या राज्यपाल को लगे कि सरकार सदन में विश्वास खो चुकी है, तो भी फ्लोर टेस्ट होता है. इसमें मुख्यमंत्री सदन में विश्वास प्रस्ताव लाता है और उस पर वोटिंग होती है. इसको ऐसे समझिए कि जुलाई 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर संकट आ गया. सदन में फ्लोर टेस्ट हुआ. इसमें कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में 99 और विरोध में 105 वोट पड़े.  इस तरह सरकार गिर गई थी.

कंपोजिट फ्लोर

जब एक से ज्यादा नेता सरकार बनाने का दावा कर दें. ऐसे हालात बनने पर राज्यपाल विशेष सत्र बुला सकते हैं और देख सकते हैं कि किसके पास बहुमत है। इसमें विधायक सदन में खड़े होकर, हाथ उठाकर, ध्वनिमत से या डिविजन के जरिए वोट देते हैं. इसको ऐसे समझ सकते हैं कि फरवरी 1998 में उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और कांग्रेस के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया गया.  इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे के अंदर कंपोजिट फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दे दिया. इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई. उन्हें 225 वोट मिले और जगदंबिका पाल को 195 वोट.

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Credit Dainik Bhaskar

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