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एक फ़िल्म से नाइंसाफ़ी

by bnnbharat.com
March 22, 2021
in समाचार
एक फ़िल्म से नाइंसाफ़ी
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बीएनएन डेस्कः मंगल ग्रह के निवासियों पर ही फ़िल्म बनी होगी शायद इसीलिए धरती वाले इसे रिलीज़ करने से कतरा रहे हैं . एक क्रांतिकारी निर्देशक, लेखक और एक्टर की वो फ़िल्म जिसे दूसरे देशों में तारीफ मिलती है मगर अपने ही मुल्क की बड़ी-बड़ी ओवर द टॉप यानि ओटीटी कंपनियाँ इस फ़िल्म को दर्शकों तक पहुँचाने से कतरा रही हैं . आप हैरान होंगे कि ऐसी कौन सी फ़िल्म है जो लाल ग्रह से संबंधित है जिसकी चर्चा मेन स्ट्रीम मीडिया में आज तक नहीं हुई. हम बात कर रहे हैं झारखंड के श्रीराम डाल्टन की फ़िल्म ‘स्प्रिंग थंडर’ की जिसे ना जाने क्यों दर्शकों तक पहुँचाने से रोका जा रहा है .विस्थापन, खनन माफिया और जल जंगल ज़मीन की जंग से जुड़ी वास्तविकता से इतनी क़रीब मूवी शायद ही बनाई गई होगी . थंडर स्प्रिंग की कहानी भले ही झारखंड की पृष्ठभूमि में हो लेकिन इसका नाता भारत के हर उस आदिवासी, दलित समुदाय से है जिनकी ज़मीन विकास के नाम पर हथिया ली गई . देश के सबसे सुखाड़ग्रस्त इलाक़ा लेकिन अपने जंगल और क़ुदरती ख़ूबसूरती  के लिए मशहूर पलामू  जिले की स्प्रिंग थंडर की शुरुआती पंक्तियाँ ही निर्देशक का मूड बता देता है . पर्दे पर डिस्क्लेमर आता है ‘’यह कहानी मंगल ग्रह की है, किसी जीवित या मृत से संबंध महज़ एक संयोग है. ‘’ ये पक्तिंयां ही बताती है कि श्रीराम डाल्टन किस तरह की हक़ीक़त से रुबरु कराने की कोशिश कर रहे हैं .यूरेनियम खनन माफिया पर आधारित ‘स्प्रिंग थंडर’ उस दौर की दास्ताँ है जब झारखंड के आदिवासी समाज और उनकी जल जंगल ज़मीन पर देश और विदेशों के बड़ी-बड़ी कंपनियों की काली नज़रें पड़नी शुरू हुई . पहली बार डेवलपमेंट शब्द से भोले-भाले लोगों का साबका पड़ा और फिर धीरे-धीरे ज़मीन ली जाने लगी . ज़मीन का मालिक अपनी ही ज़मीन पर मज़दूरी करने लगा . ज़मींदार से ठेकेदार बना चुन्नू ठाकुर, कन्नू लोहार और उसका बेटा गोल्डन, बस स्टैंड का गुंडा मुन्ना भैया, सुरेश जैसे किरदारों को देख कहीं से भी ऐसा एहसास नहीं होता कि श्रीराम ने फ़िल्म की पटकथा और निर्देशन में बेईमानी की हो . अस्सी और नब्बे के दशक में पलामू में जो महौल था और जिस तरह विस्थापन की साज़िशें रची जा रही थी उसका दस्तावेज है स्प्रिंग थंडर . फ़िल्म में अपनी आवाज़ से रगो में रवानगी भरने वाली मेघा श्रीराम डाल्टन बताती हैं की ‘राम ने बहुत ही कठिन विषय चुना था, तीन-चार परतों और तीन पीढ़ियों ये कहानी थी, पलामू के युवा राह भटक रहे थे, उन्होंने सोचा इस मिट्टी का क़र्ज़ यहाँ के युवआों को राह दिखा कर चुकाई जा सकती है इसीलिए फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया . ‘’  स्प्रिंग थंडर की पूरी शूटिंग पलामू में हुई . क़रीब दो लाख लोगों का कहीं ना कहीं इस फ़िल्म में योगदान रहा है . मेघा बताती हैं कि फ़िल्म बनाने से पहले उन्हें आने वाली चुनौतियों के बारे में मालूम था लेकिन कहानी ज़रूरी थी और हमारे आस पास की कहानी थी इसलिए फ़िल्म बनाई . ये श्रीराम डाल्टन का जूनून ही है कि उन्होंने अपनी पूँजी लगाकर इतनी बड़ी फ़िल्म बनाई और आज भी रिलीज़ के लिए सही प्लेटफ़ॉर्म का इंतजार कर रहे हैं . मेघा बताती हैं कि स्प्रिंग थंडर में काम कर चुके कई कलाकारों ने इससे प्रभावित होकर स्वतंत्र फ़िल्म बना डाली. फ़िल्म में पान सिंह तोमर और दबंग टू में पहचान बना चुके रवि साह ने अहम भूमिका अदा की . इसके अलावा तीन दशकों से बॉलीवुड में कई फ़िल्मों में अदाकारी कर चुके आकाश खुराना ने ज़मींदार ठेकेदार चुन्नू पांडे की भूमिका शानदार तरीक़े से पर्दे पर उतारा है . आकाश खुराना को बतौर चुन्नू पांडे देख झारखंड के लोग क़तई अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं कि वो बाहर के कलाकार हैं . मेघा डाल्टन की आवाज़ कई बार बैक ग्राउंड से दर्शकों बांधने में कामयाब मानी जा सकती है . म्यूज़िक बारी-तुतुल और लेस्ली लेविस ने दिया है . स्थानीय स्तर पर बनी स्प्रिंग थंडर का 2018 में यूएसए के सैनफ्रांसिस्को में आयोजित साउथ एशिया फ़िल्म फ़ेस्टिवल में वर्ल्ड प्रीमियर हो चुका है . होलीबुल इंटरटेनमेंट के बैनर तले बनी स्प्रिंग थंडर को झारखंड की फ़िल्म नीति का भी लाभ नहीं मिल पाया . सौ फिसदी यहीं पर फ़िल्माई गई फ़िल्म को आज भी पर्दे पर आने का इंतज़ार है .  श्रीराम डाल्टन को 61 वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार में कला संस्कृति कैटेगरी में उनकी फ़िल्म द लॉस्ट बहरूपिया के लिए रजत कमल भी मिल चुका है . उन्होंने जाने माने सिनेमोटोग्राफर अशोक मेहता के साथ काम किया है  और फ़िल्म उन्हें समर्पित भी की है . आपको बता दें कि जल-जल-ज़मीन की जंग के लिए श्रीराम डाल्टन मुंबई से झारखंड तक की पैदल यात्रा कर चुके हैं. इस यात्रा का मक़सद नदियों को बचाना और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को रोकना था. वे आज भी इसी मक़सद से पलामू-लातेहार जिलों में सक्रिय हैं. दर्शकों से वंचित स्प्रिंग थंडर भले ही देश की इंटरटेनमेंट इंटस्ट्री की जाल में उलझी हुई हो लेकिन श्रीराम डाल्डन की ‘वसंत की वज्रनाद’ जब भी सुनहरे पर्दे पर आएगी उसकी गूंज दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज करेगी .

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