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जहां उतरने का किसी ने साहस नहीं किया उस अंधेरे हिस्से में कदम रखेगा भारत

चंद्रयान 2: लागत इजराइल से 30% कम, 16 मिनट में पृथ्वी की कक्षा में पहुंचेगा

15 जुलाई को रवाना हो रहा भारत का चंद्रयान 2 मिशन पूरी तरह भारतीय तकनीक से चंद्र सतह पर सॉफ्ट लैडिंग करवाने जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) का चंद्रयान-2 मिशन 15 जुलाई को तड़के 2 बजकर 51 मिनट पर श्रीहरिकोटा के सतीश धवन सेंटर से लॉन्च होगा। इसके 6 सितंबर को चांद की सतह पर उतरने का अनुमान है।

इससे पहले चंद्रयान 1 में भी हमने चंद्रमा पर मून इंपैक्ट प्रोब (एमआईपी) उतारा था, लेकिन इसे उतारने के लिए नियंत्रित ढंग से चंद्रमा पर क्रैश करवाया गया था। इस बार हम विक्रम (लैंडर) और उसमें मौजूद प्रज्ञान (छह पहिये का रोवर) चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करवाएंगे।

मिशन बनाने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार लॉन्च की रिहर्सल पूरी हो चुकी हैं। विक्रम और प्रज्ञान को भी पूरी तरह भारतीय तकनीक और संसाधनों से तैयार किया गया है। चंद्रयान 2 का बाकी हिस्सा ऑर्बिटर बनकर यानी चंद्रमा की परिक्रमा करते हुए विभिन्न प्रकार के शोध और अध्ययन करता रहेगा।

चंद्रयान-2 की उल्टी गिनती शुरू

  • चंद्रयान-1 का वजन 1380 किलो था, चंद्रयान-2 का वजन 3877 किलोग्राम रहेगा
  • चंद्रयान-2 के 4 हिस्से, पहला- जीएसएलवी मार्क-3, भारत का बाहुबली रॉकेट कहा जाता है, पृथ्वी की कक्षा तक जाएगा
  • दूसरा- ऑर्बिटर, जो चंद्रमा की कक्षा में सालभर चक्कर लगाएगा
  • तीसरा- लैंडर विक्त्रस्म, जो ऑर्बिटर से अलग होकर चांद की सतह पर उतरेगा
  • चौथा- रोवर प्रज्ञान, 6 पहियों वाला यह रोबोट लैंडर से बाहर निकलेगा और 14 दिन चांद की सतह पर चलेगा

लखनऊ की बेटी है चंद्रयान-2 की मिशन डायरेक्टर

लखनऊ। ‘चंद्रयान-2’ जब चांद की कक्षा में प्रवेश करेगा तो पूरे देश के लिए वह पल उपलब्धि का जश्न मनाने वाला होगा। लखनऊ के लिए यह पल इसलिए और भी खास होगा, क्योंकि इस मिशन की डायरेक्टर इसरो की सीनियर साइंटिस्ट रितु करिधाल श्रीवास्तव लखनऊ की बेटी हैं। वह यहां राजाजीपुरम की रहने वाली हैं। माता-पिता का निधन हो चुका है। भाई रोहित कहते हैं कि हमें नाज है अपनी बहन पर। ज्यादा कुछ कहने से अच्छा है कि हम देश के इस मिशन की सफलता के लिए प्रार्थना करें। रितु ने लखनऊ विश्वविद्यालय से फिजिक्स में ग्रेजुएशन किया था। फिर गेट पास करने के बाद मास्टर्स डिग्री के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ  साइंसेज जॉइन किया। यहां से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिग्री ली। वह 1997 से इसरो से जुड़ीं।

पूर्व मिशन का ही नया संस्करण

1.  चंद्रयान-2 मिशन क्या है? यह चंद्रयान-1 से कितना अलग है?

चंद्रयान-2 वास्तव में चंद्रयान-1 मिशन का ही नया संस्करण है। इसमें ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं। चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा। यह लैंडिंग चांद के दक्षिणी ध्रुव पर होगी। इसके साथ ही भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारने वाला पहला देश बन जाएगा।

2.  चंद्रयान-2 की लागत कितनी है, यह हाल ही में दूसरे देशों द्वारा भेेजे गए मिशन से कितना सस्ता है?

यानलागत
चंद्रयान-2978 करोड़ रुपए
बेरशीट (इजराइल)1400 करोड़ रुपए
चांगई-4 (चीन)1200 करोड़
  1. *इजराइल ने फरवरी 2019 में बेरशीट लॉन्च किया था, जो अप्रैल में लैंडिंग के वक्त क्रैश हो गया। चीन ने 7 दिसंबर 2018 को चांग’ई-4 लॉन्च किया था, जिसने 3 जनवरी को चांद की सतह पर सफल लैंडिंग की।

4.  मिशन लॉन्च होने के बाद चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा में जाने में कितना समय लगेगा?

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मिशन को जीएसएलवी मार्क-III से भेजा जाएगा। रॉकेट को पृथ्वी की कक्षा में पहुंचने में 16 मिनट का समय लगेगा। सुबह 3 बजकर 7 मिनट के आसपास चंद्रयान-2 पृथ्वी की कक्षा में पहुंच सकता है।

5.  चंद्रयान-2 के पृथ्वी की कक्षा में जाने के बाद क्या होगा?

चंद्रयान-2 सोलह दिनों तक पृथ्वी की कक्षा के 5 चक्कर पूरे करेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर यान को पृथ्वी से सीधे चांद की तरफ भेजते हैं, तो इससे ईंधन बहुत खर्च होगा। चंद्रयान-2 को सीधे चांद की तरफ भेजने के लिए 1 सेकंड में 11.2 किमी की रफ्तार चाहिए, लेकिन जीएसएलवी मार्क-III इस रफ्तार से उड़ान नहीं भर सकता। इसी वजह से यान को पृथ्वी की कक्षा के 5 चक्कर लगाने पड़ेंगे ताकि वह धीरे-धीरे गुरुत्वाकर्षण से बाहर आए। यान अंडाकार (इलिप्टिकल) चक्कर लगाएगा। जब यह पृथ्वी के सबसे पास होगा, तब ऑर्बिटर और धरती के बीच 170 किमी की दूरी होगी। जब यह सबसे दूर होगा तो पृथ्वी और ऑर्बिटर के बीच 40,400 किमी की दूरी होगी। हर चक्कर के साथ पृथ्वी से चंद्रयान-2 की दूरी बढ़ती जाएगी।

6.  चंद्रयान-2 के पृथ्वी की कक्षा से बाहर जाने के बाद क्या होगा?

पृथ्वी की कक्षा के 5 चक्कर पूरे करने के बाद इसे 2 या उससे ज्यादा दिन का वक्त चंद्रमा की कक्षा तक पहुंचने में लगेगा।

7.  क्या ऑर्बिटर चंद्रमा के चक्कर भी लगाएगा?

ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में पहुंचकर 4 चक्कर लगाएगा। इसका कारण यह है कि पहली बार कोई देश दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर उतारेगा। इसके लिए इसरो के ऑर्बिटर को चंद्रमा की सतह की निगरानी करनी होगी ताकि सुरक्षित लैंडिंग हो सके।

8.  ऑर्बिटर से लैंडर कैसे अलग होगा? उसे सतह तक पहुंचने में कितना समय लगेगा?

चंद्रमा की कक्षा में भी ऑर्बिटर पहले अंडाकार चक्कर लगाएगा। इसके बाद इसे सर्कुलर ऑर्बिट (गोलाकार) में लाया जाएगा। जब ऑर्बिटर चंद्रमा की सतह से 100 किमी ऊपर होगा, तभी लैंडर उससे अलग हो जाएगा। इसके बाद लैंडर जब चंद्रमा की सतह से 30 किमी ऊपर होगा, तब उसकी गति धीमी होती चली जाएगी ताकि सॉफ्ट लैंडिंग हो सके। लैंडर को चंद्रमा की सतह तक पहुंचने में करीब 4 दिन का वक्त लगेगा।

9.  लैंडर से रोवर को निकालने में कितना समय लगेगा?

लैंडर (विक्रम) के चांद की सतह पर उतरने के बाद उसमें से रोवर (प्रज्ञान) को निकालने में 4 घंटे का समय लगेगा। क्योंकि रोवर 1 सेकंड में सिर्फ 1 सेमी की दूरी तय कर सकता है।

10.  मिशन लॉन्च होने के कितने दिनों बाद लैंडर चांद की सतह पर पहुंचेगा?

मिशन लॉन्च होने के बाद लैंडर को चांद की सतह पर उतरने में 54 दिन का समय लगेगा।

11.  ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर क्या काम करेंगे?

चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच कम्युनिकेशन करना है। इसके साथ ही ऑर्बिटर चांद की सतह का नक्शा तैयार करेगा, ताकि चांद के अस्तित्व और विकास का पता लगाया जा सके। वहीं, लैंडर और रोवर चांद पर एक दिन (पृथ्वी के 14 दिन के बराबर) काम करेंगे। लैंडर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं। जबकि, रोवर चांद की सतह पर खनिज तत्वों की मौजूदगी का पता लगाएगा।

 


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