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झाविमो एक बार फिर टूट के कगार पर, बाबूलाल मरांडी पड़े अकेले, विधायक प्रदीप यादव, बंधु तिर्की भाजपा में जाने को तैयार नहीं

by bnnbharat.com
January 15, 2020
in समाचार
झाविमो एक बार फिर टूट के कगार पर, बाबूलाल मरांडी पड़े अकेले, विधायक प्रदीप यादव, बंधु तिर्की भाजपा में जाने को तैयार नहीं
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रांची: झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) एक बार फिर टूट के कगार पर पहुंच गया है. विधानसभा चुनाव 2019 में झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी समेत तीन विधायक चुनाव जीत कर आये है. चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाने के बाद बाबूलाल मरांडी ने भारतीय जनता पार्टी में घर वापसी का संकेत दिया है, लेकिन पार्टी के दो अन्य विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की भाजपा में विलय के पक्ष में नहीं हैं.

झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी चंद दिनों पहले तक भाजपा में पुनर्वापसी की बजाय कुतुबमीनार से कूदना बेहतर विकल्प बताते थे, लेकिन अब उनके भाजपा में वापसी की पटकथा लिखी जा रही है.

14 सालों की जुलाई के बाद बाबूलाल को फिर पुराने घर की याद आयी है. विदेश यात्रा से लौटने के साथ ही बाबूलाल मरांडी द्वारा इस संबंध में निर्णय ले लिये जाने की संभावना है.

बताया जा रहा है कि बाबूलाल मरांडी भाजपा में शामिल होने पर राजधनवार विधानसभा सीट से त्यागपत्र दे देंगे और उपचुनाव लड़ेंगे अथवा राज्यसभा में जाएंगे.

दूसरी तरफ पोड़ैयाहाट से निर्वाचित प्रदीप यादव और मांडर से चुने गये बंधु तिर्की ने भाजपा में शामिल होने की संभावनाओं को खारिज कर दिया है.

प्रदीप यादव ने कहा कि उनकी ओर से जो मुद्दे पूर्व में उठाये गये थे, वे अभी विद्यमान है और अडाणी पावर का विरोध, विस्थापन और पुनर्वास का जो मुद्दा उठाया था, वह अब भी बरकरार रहा है.

वहीं बंधु तिर्की ने भी साफ किया है कि जिस तरह से आग और पानी का मिलन संभव नहीं है, उसी तरह से उनका भी भाजपा से मिलन संभव नहीं है.

गौरतलब हैं कि बाबूलाल मरांडी ने दलबदल को रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाते हुए अपनी पार्टी के सभी इकाइयां भंग कर रखी हैं. विदेश यात्रा से लौटने के बाद बाबूलाल मरांडी पार्टी की नई केंद्रीय कार्यकारिणी की घोषणा करेंगे और नयी केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक में झाविमो के भाजपा में विलय की औपचारिकता पूरी किये जाने की संभावना है. इसके साथ ही 14 साल बाद आरएसएस के निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्ता बाबूलाल मरांडी का वनवास खत्म हो जायेगा.

दूसरी तरफ राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 28 सीटों में 26 हार चुकी भाजपा की भी राज्य में एक मजबूत आदिवासी नेता की तलाश खत्म हो जाएगी.

ज्ञातव्य हो कि वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में झाविमो के आठ विधायक चुनाव जीत कर आये थे, जिनमें से छह विधायक चुनाव के तुरंत बाद भाजपा में शामिल हो गये थे, जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष के न्यायाधिकरण में भी वर्षां तक दल-बदल का मामला चला और फैसला छह विधायकों के पक्ष में आया था.

2019 में बाबूलाल मरांडी समेत तीन विधायक चुनाव जीत कर आये है, परंतु इस बार झाविमो विधायक नहीं, बल्कि खुद पार्टी प्रमुख ही भाजपा में शामिल होना चाहते है.

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