ब्यूरो चीफ,
रांची: झारखंड राज्य क्रिकेट एसोसिएशन (जेएससीए) में रामचरित मानस की वह प्रचलित कहावत चरितार्थ होती है, जिसके दोहे में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है सबको नचावत राम गोसाईं… होईहे वही जो राम रची राखा. इस काहवत की तरह ही जेएससीए में एक बड़े पदधारी के इशारे पर ही सारे काम होते हैं. कार्यकारिणी के अन्य सदस्य शहंशाह अकबर के नौरत्नों की तरह ही हैं. जो अपने बॉस की बातों पर एक सिरे से तामिला करते हैं. जेएससीए को बताया जाता है कि यह झारखंड का अनूठा संस्थान है, जो क्रिकेट के लिए पूरी तरह समर्पित है. संगठन में 740 से अधिक सदस्य हैं. इसमें अधिकतर सदस्य ऐसे हैं, जिनका क्रिकेट से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा है. बिल्डर, बड़े बिजनेसमैन, चिकित्सक, धाकड़ लोग और अन्य भी सदस्य हैं. ये सदस्य अपने बॉस के लिए पूरी तरह समर्पित हैं.
प्रबंध समिति की काबिलियत से ही विपक्षी को नहीं मिला मौका
जेएससीए की प्रबंध समिति की यह काबिलियत है कि अब तक किसी भी विपक्षी लोगों को कार्यकारिणी में काबिज होने का मौका नहीं मिला है. प्रबंध समिति को अपने पसंदीदा प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए किसी भी हद तक जाने तक की छूट है. सचिव का पद ऐसा है, जिन्हें मैनेजर का रूतबा मिला हुआ है. सब कुछ मैनेज करना इन्हीं के जिम्मे है. बोकारो जिला क्रिकेट संघ के सचिव का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें झारखंड के कई जिलों में पैसे लेकर खिलाड़ियों को मुकाम पहुंचाने की बातें कही गयी थी. इसके बाद कार्रवाई भी हुई. इनका ऑडियो-वीडियो 20 जनवरी 2019 को काफी वायरल हुआ था पर नयी कार्यकारिणी के चुनाव में 22 सितंबर 2019 को बोकारो और रामगढ़ जिला के सचिव ने आजीवन सदस्य के रूप में अपना वोट कास्ट किया.
सिक्रेट बैलेट की जगह सीरियल नंबर प्रिंट करा कर कराया चुनाव
कार्यकारिणी के चुनाव में यह बातें भी सामने आ रही हैं कि सिक्रेट बैलेट की जगह सीरियल नंबर प्रिंट कर चुनाव कराया गया. शिकायत करने पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हुई. टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी को होनररी मेंबर कहते हुए वोट देने नहीं दिया गया. वहीं सौरभ तिवारी, वरुण एरोन, इशांक जग्गी, राहुल शुक्ला, देवव्रत को वोट देने दिया गया. प्रभारी सचिव की नियुक्ति पर माननयी सर्वोच्च न्यायालय ने लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों का अनुपालन कराने का सभी बीसीसीआइ सदस्यों को निर्देश दिया गया था पर इसका अनुपालन झारखंड में ही नहीं हो पाया. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी चुनाव के पूर्व संशोधन और अन्य आपत्तियों पर भी प्रबंध समिति ने कभी इंपलाइ नहीं किया.

