रांची: भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि राज्य में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की भारी तादाद है. लाखों परिवार ऐसे हैं, जो दिन में कमाते हैं तब उनके यहां शाम का चूल्हा जल पाता है. पूरे देश की भांति झारखंड अभी वैश्विक महामारी कोरोना के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है और पूरे झारखंड में लाॅकडाउन है.
ऐसी भीषण विपदा के कारण झारखंड के लाखों परिवारों को एक जून तक भोजन कैसे मिले, उन्हें इसकी चिंता सताना स्वाभाविक है. सरकार द्वारा इस संकट से निपटने व इन वंचितों को भोजन मुहैया कराने के लिए राज्य भर में पंचायत व थाना स्तर पर दाल-भात केन्द्र और सामुदायिक रसोई संचालित किया गया है. सरकार के आंकड़े के अनुसार 342 थाना में सामुदायिक किचन, 875 दाल-भात केन्द्र और 498 विशेष दाल-भात केन्द्र संचालित किए जा रहे हैं. वहीं 4562 पंचायतों में मुख्यमंत्री दीदी किचन के माध्यम से लोगों को भोजन मुहैया कराई जा रही है. इस प्रकार राज्य भर में कुल 6277 भोजन केन्द्र चलाए जा रहे हैं और प्रत्येक केन्द्र में 200 लोगों यानि कुल 12 लाख 55 हजार 400 लोगों को भोजन कराने की बात बताई जा रही है.
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बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिख कर कहा कि पंचायतों से उसके अन्तर्गत पड़ने वाले गांवों की दूरी के मद्देनजर पंचायत मुख्यालय में केन्द्र का संचालन करना थोड़ा अव्यवहारिक है. इस व्यवस्था को और भी सरल बनाते हुए इसे गांव स्तर तक ले जाने की जरूरत है. भोजन से वंचित लोगों के लिए पंचायत मुख्यालय तक आकर भोजन करना काफी कष्टदायक है. उदाहरण के तौर पर मैं गिरिडीह जिले के तिसरी प्रखंड अन्तर्गत पड़ने वाले अपने पैतृक ग्राम पंचायत बेलवाना का ही उदाहरण आपके समक्ष रख रहा हूं. इस पंचायत में कुल 14 गांव हैं. पंचायत मुख्यालय बेलवाना से उसके अन्तर्गत पड़ने वाले गांव लालपुर, कानीचिहार, सिरसिया, कोदाईबांक की दूरी क्रमश: 8 किमी, 7 किमी, 5 किमी और 3 किमी है. अब सवाल है कि 5-8 किलोमीटर की दूरी तय करके 200 लोगों का भोजन कराना कैसे संभव है ? हमने जानकारी के लिए अपने स्तर से नमूने के तौर पर तिसरी प्रखंड के पांच-छः पंचायतों में सर्वे कराया है. बेलवाना पंचायत में 180, खिजूरी में 300, मनसाडीह में 100, लोकाय में 200, थानसिंहडीह में 275, तिसरी में 150, खटपोंक में 175, चंदवापहरी व कर्णपुरा गांव में लगभग 45 परिवारों के पास राशनकार्ड नहीं है. इन्हें अपने स्तर से मैनें राशन उपलब्ध करवाया. एक अनुमान के मुताबिक औसतन हर पंचायत में 150 से 200 परिवार के पास राशनकार्ड नहीं हैं. इसमें ज्यादातर लोग आदिवासी व दलित समुदाय से हैं. राज्य में भूख से मौत की बात, जो चर्चा में रही है, उनमें मृतक भी अधिकांशतः इसी समुदाय से थे.
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उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इसके लिये स्थानीय प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों का सहयोग लिया जा सकता है. अभी सारे स्कूल बंद हैं. इन शिक्षकों के माध्यम से गांव तक कच्चा अनाज पहुंचाने की व्यवस्था कर देनी चाहिए. प्रत्येक गांव में स्वयं सहायता समूह भी काम कर रहे हैं. उन्हें भी थोड़ा प्रशिक्षित कर मास्क इत्यादि का निर्माण कराया जा सकता है और मास्क लगाने के लिए ये लोगों को जागरूक भी कर सकते हैं. संभव हो तो इनसबों का मनोबल बढ़ाने के लिए कुछ प्रोत्साहन राशि भी मुहैया करा देनी चाहिए. सोशल डिस्टेंसिंग के अनुपालन की जिम्मेवारी भी शिक्षकों को दे देनी चाहिए. एक गांव में औसतन 10000 रूपये की राशि भी उपलब्ध करा दी जाती है तो लोग भूखे नहीं रहेंगे. राज्य में 32640 गांव हैं. इस प्रकार प्रति गांव इतनी राशि देने पर अधिकतम 32 करोड़ रूपये खर्च होगा. हां, इसमें आदिवासी, दलित और गरीब तबके के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा.

