SACH KE SATH
add_doc_3
add_doctor

महज 56,000 आबादी वाले देश ने चीन को दिखाया ठेंगा, नजरें गड़ाए बैठे ड्रैगन को दिया बड़ा झटका

ग्रीनलैंड: महज 56 हजार आबादी वाले यह देश, जो 12 महीने बर्फ से ढंका रहता है. दुनिया के सुदूर हिस्से आर्कटिक में हुए चुनावों पर अचानक से पूरी दुनिया की नजरें थीं. चीन, अमेरिका यहां होने वाले चुनावों पर नजरें गड़ाए बैठे थे. मंगलवार को यहां चुनाव हुए. वजह, सरकार में पैदा हुए मतभेद. और मतभेद की वजह एक खनन परियोजना. इस परियोजना को हथियाने के पीछे था ड्रैगन.
मगर ग्रीनलैंड की मुट्ठीभर जनता ने चीन के मंसूबों पर पानी फेर दिया. यहां हुए चुनावों में लोगों ने ड्रैगन द्वारा दिखाए जा रहे ‘विकास’ के सपने को नकार दिया. 40 साल में दूसरी बार ऐसा हुआ है कि यहां वामपंथी पार्टी इनुइत एटाकाटीगीट (कम्युनिटी ऑफ द पीपुल) को चुनावों में जीत मिली है. पार्टी को इस बार 37 फीसदी वोट मिले जबकि पिछली बार उसे 26 प्रतिशत वोट ही मिले थे
चीन का साथ देने पर गंवानी पड़ी सत्ता
खनन परियोजना का समर्थन करने वाली सोशल डेमोक्रेटिक सियुमट (फॉरवर्ड) को 29 फीसदी वोट ही मिले. 1979 में डेनमार्क से शासन करने का अधिकार मिलने के बाद अधिकतर मौकों पर यही पार्टी सत्ता में बनी रही. चुनावों में जीत हासिल करने वाली वामपंथी पार्टी ग्रीनलैंड में खनन परियोजना के खिलाफ है और इसकी जीत पूरी दुनिया में खनन इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका है.
आखिर क्यों है चीन की ग्रीनलैंड पर नजर
बताया जाता है कि ग्रीनलैंड में 17 तत्वों से मिलकर बना एक दुर्लभ खनिज मिलता है. इसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स और हथियार बनाने के लिए किया जाता है. यूरेनियम का छठा सबसे ज्यादा भंडार भी यहीं पर है. क्वेनेफील्ड खदान का स्वामित्व जिस कंपनी ग्रीनलैंड मिनरल्स के पास है, उसका कहना है कि ये खदान दुर्लभ खनिज की वजह से दुनियाभर में सबसे अहम उत्पादक बन सकती है. ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ग्रीनलैंड मिनरल्स को चीन का समर्थन हासिल है. अमेरिका भी यहां निवेश करना चाहता है. अन्य देश भी खनिज के लिए ग्रीनलैंड की ओर देख रहे हैं.
दोनों पार्टियों के तर्क
सियुमट पार्टी इसका समर्थन करती है. उसका तर्क था कि इससे लोगों को रोजगार मिलेगा. सालाना करोड़ों डॉलर की कमाई होगी. मगर इनुइत एटाकाटीगीट का कहना है कि इससे रेडियो एक्टिव प्रदूषण और जहरीले कचरे की समस्या खड़ी हो जाएगी. ग्रीनलैंड पहले ही बर्फ के पिघलने से चिंतित है.
इन वजहों से भी दुनिया की नजर ग्रीनलैंड पर
बर्फ खिसकने की वजह से यहां से नए समुद्री रास्ते निकलने की संभावना भी बढ़ती जा रही है. इससे जहाजों के आवागमन का समय कम होगा. डेनमार्क, रूस और कनाडा के बीच बीते कुछ समय में विवाद बढ़ा है. इसके अलावा रूस आर्कटिक में अपनी सैनिक गतिविधियां भी बढ़ा रहा है.
मछली कारोबार पर टिकी अर्थव्यवस्था
ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था मछलियों के कारोबार पर टिकी हुई है. इसके अलावा डेनमार्क से भी उसे सब्सिडी मिलती है. यहां के बड़े हिस्से पर अभी भी डेनमार्क का नियंत्रण है. यह दुनिया का 12वां सबसे बड़ा देश है. साल 2019 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह ग्रीनलैंड को खरीदना चाहते हैं. ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यहां रिकॉर्ड स्तर पर बर्फ पिघलने लगी है.