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अभिभावक – बाल संवाद (परवरिश-5)

by bnnbharat.com
May 7, 2020
in Uncategorized
अभिभावक – बाल संवाद (परवरिश-5)

अभिभावक - बाल संवाद (परवरिश-5)

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राहुल मेहता

रांची: तृप्ति बहुत खुश थी. पहली बार वह वर्ग में प्रथम आयी थी. उसने ख़ुशी- खुशी पिताजी को अपना रिजल्ट दिखाया. पर यह क्या? पिताजी तो भड़क उठे. “इतना कम अंक, 90% भी नहीं, पढ़ाई में मन नहीं लगता क्या ?” यह तृप्ति के लिए वज्रपात से कम नहीं था. उसे तो याद भी नहीं रहा, पिताजी ने क्या- क्या कहा.

संवाद बच्चों के विकास के लिए अतिआवश्यक है. उचित संवाद न केवल सीखने में सहायक होता है बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व को भी प्रभावित करता है, जो उसके सफलता का एक प्रमुख कारण बनता है. संवाद का अर्थ है लोगों से जानकारी, विचारों और भावनाओं को साझा करना. इसमें सुनना, दूसरे व्यक्ति को देखना और बोलना, इशारे एवं शारीरिक भाव-भंगिमायें भी शामिल होती हैं. बच्चों से क्या बोला जा रहा है यह तो महत्वपूर्ण है ही, कैसे बोला जा रहा है यह ध्यान रखना भी जरुरी है.

बच्चे के उम्र के अनुसार संवाद कला में परिवर्तन करें :-

उम्र अनुसार बच्चे का सामान्य व्यवहार बदलता रहता है. अतः अभिभावकों की संवाद कला तदनुरूप होनी चाहिए. शैशव काल में बच्चे सुन कर सिखते हैं और उनकी प्रतिक्रिया भिन्न होती है. बालावस्था में अक्सर बच्चों की प्रशंसा करें, बुरे व्यवहार पर टोके लेकिन विकल्प के साथ.  इस उम्र में बच्चे बहुत सवाल करते हैं. उनके सवालों को न तो टालें न ही झुंझलायें. आपके उत्तर छोटे और सही होने चाहिए. संवाद से ही बच्चों को अपनी बारी का इंतजार और दूसरों के विचारों को स्वीकार करना सिखाया जा सकता है. बच्चे अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखते हैं. अतः डांटने के बजाय समस्याओं को हल करने में मदद करें.

किशोरावस्था में उन्हें अधिक स्वतंत्रता, आत्मसम्मान स्वीकृति, बनाने की चाहत और यौनिकता संबंधी उत्सुकता, भविष्य की चिंता आदि हो सकती है. अतः बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताएं, अनुभवों को साझा करें, उनके विचारों और चिंताओं को सुनें, तारीफ करें और उनकी शिक्षा में रुचि दिखाएं. उन्हें जरुर बताएं कि सभी निर्णयों के परिणाम होते हैं. उन्हें सामाजिक कुरीतियों की शिक्षा भी दी जानी चाहिए.

अच्छा संवाद:

  • बच्चे को अपनी विचारों और चिंताओं, कड़वाहट को व्यक्त करने दें.
  • आंख मिला कर बात करें.
  • बच्चे जो कह रहे हैं, उसमें रुचि दिखाएं.
  • जोर से न बोले. चिल्लाये नहीं.
  • ऐसा प्रश्न पूछें जिसका विस्तृत जवाब संभव हो.
  • अपने अनुरोधों को सरल रखें.
  • भाषा की मर्यादा पर ध्यान दें.
  • नए शब्दों का अर्थ बताएं
  • हर प्रश्न का उत्तर देने के बजाय साथ मिल कर हल खोजें
  • सक्रिय रूप से सुनें और अक्सर अपने बच्चों की प्रशंसा करें!

बच्चों के साथ नियमित रूप से “चर्चा का समय” निर्धारित करने का महत्व

  • अभिभावक और बच्चे दोनों संवाद का सही तरीका सीखते हैं.
  • यह बच्चों में उम्र अनुसार व्यवहार और नियम के प्रति समझ बढ़ाता है.
  • यह बच्चों में आत्मसम्मान का निर्माण करता है.
  • यह परिवार के सदस्यों के बीच सहयोग और विश्वास बढ़ाता है.
  • समस्याओं के विकराल होने से पूर्व उसे हल करने का यह अच्छा तरीका है.

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