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सोहराय कला हमारा गर्व, हमारी पहचान हैः डॉ. स्टेफी टेरेसा मुर्मू

आदिवासी व लोक चित्रकारों की शिविर में सोहराय कला बना आकर्षण का केंद्र

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लातेहार(नेतरहाट): झारखंड के अनेक जिलों में कोहबर एवं सोहराय की समृद्ध परंपरा रही है. सोहराय पर्व, दीवाली के तुरंत बाद फसल कटने के साथ मनाया जाता है. इस अवसर पर आदिवासी अपने घर की दीवारों पर चित्र बनाते है. उक्त बातें अलका इमाम ने कहीं. वे यहां नेतरहाट में आदिवासी एवं लोक चित्रकारों के शिविर में सोहराय चित्रकला को बना रही हैं. अलका इमाम यहां अपनी पूरी टीम मालो देवी, अनीता देवी, पुतली देवी और रुदन देवी के साथ सोहराय चित्रकला को एक नया आयाम देने में जुटी हैं.

अलका इमाम ने कहा कि ज्योग्राफिकल टैग मिल जाने से इस कला पर कोई अब दावा नहीं ठोक सकता. देश में अब कोई भी इसे अपनी अपने राज्य की कलाकृति नहीं बता सकता है. उन्होंने बताया कि झारखंड से इसकी पहचान जुड़ी हुई है. अभी भी हजारीबाग के 13 गांव में यह चित्रकला बनाई जा रही है. इस कला की यह विशेषता है कि यह एक महिला प्रधान कला है.

क्या है सोहराय व कोहबर कला ?

सोहराय कला झारखंड की प्रमुख लोक कला है. यह चित्रकला मानव सभ्यता के विकास को दर्शाता है. मूल रूप में दोनों चित्रकला में नैसर्गिक रंगों का प्रयोग होता है. इन चित्रों में दीवारों की पृष्ठभूमि मिट्टी के मूल रंग की होती है. इस चित्रकारी में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है.

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लाल, काला, पीला तथा सफेद रंग पेड़ की छाल व मिट्टी से बनाए जाते हैं. सफेद रंग के लिए दूधी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है काला रंग भेलवा पेड़ के बीज को पीसकर तैयार किया जाता है. मिट्टी के घरों की अंदरूनी दीवार को ब्लैक एंड वाइट, बेल बूटा, पत्तों तथा मोर का चित्र बनाकर सजाया जाता है.

गीत गाकर झूमते हुए बनाई जाती है ये चित्रकला

सोहराय चित्रकला की एक और खास बात यह है कि यह कला लोकगीत गाकर झूमते हुए बनाई जाती है. चूंकि यह कला पर्व से संबंधित है लोग इसे शगुन के रूप में प्रसन्न होकर बनाते हैं.

सोहराय कला हमारा गर्व, हमारी पहचान हैः डॉ. स्टेफी टेरेसा मुर्मू

आदिवासी एवं लोक चित्रकारों के प्रथम राष्ट्रीय शिविर में भाग लेने पहुंची डॉक्टर स्टेफी टेरेसा मुर्मू ने कहा कि सोहराय हमारे संथाल की जमीनी मिट्टी से जुड़ी हुई कला है. यह हमारा गर्व, हमारी पहचान है. हमारा दायित्व है कि इस कला को हम दुनिया के सामने लेकर जाएं. उन्होंने कहा कि यह कला शुरू में घरों के अंदर तक सीमित रहती थी, हम जैसे चित्रकार इस कला को घर के दहलीज से बाहर लाकर दुनिया के समक्ष एक नई पहचान देने में जुटे हैं. बताते चलें कि डॉक्टर मुर्मू यहां शिविर में सोहराय चित्रकला की जेरेड़ चित्र बना रही हैं.

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