रांची: गौशाला 1904 से स्थापित है. वहीं इसके बाद हरमू मुक्ति धाम भी 1913 में स्थापित हुआ था. यहां भी अस्थि कलश को रखने की व्यवस्था है. हरमू मुक्ति धाम में अबतक 40 अस्थि कलश जमा हैं. बहरहाल लोगों की जिंदगी अनमोल है और इसी वजह से सरकार ने इस बात को समझते हुए पूरे देश मे लॉक डाउन लागू किया. फिलहाल इन अस्थि कलशों में रखे दिवंगत आत्माओं को मोक्ष के लिए लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार करना पड़ेगा.
वैश्विक कोरोना महामारी के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के कारण सामान्य जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित हुई है. पूर्ण तालाबंदी की वजह से न सिर्फ जीवित व्यक्ति ही परेशान है,बल्कि इस दौरान दुनिया छोड़ कर चले जाने वाले लोगों को भी मोक्ष प्राप्ति के लिए परिस्थितियों के सामान्य होने का इंतजार करना पड़ रहा है.
सनातन धर्म में मृत्यु के बाद मृतकों की अस्थियों को गंगा और अन्य नदियों में विसर्जित करने और बिहार के गया में स्थित फल्गू नदी में पिंडदान करने की परंपरा रही है, लेकिन राजधानी रांची से गंगा नदी काफी दूर है और लॉकडाउन में सिर्फ बड़ी मुश्किल से अंत्येष्टि ही हो पा रही है, पिंडदान और अस्थियों को विसर्जित करने के लिए शहर से बाहर जाने की अनुमति नहीं मिल रही है जिस कारण लॉकडाउन में इन अस्थि कलशों को ले जाना संभव नहीं हो पा रहा है. यही वजह है कि रांची के गौशाला में बने अस्थि कलश का लॉकर पूरी तरह से फुल हो गया है.
लॉक डाउन काफी लंबा हो गया है, जिसके कारण 16 लॉकर और उसके बाद बने अस्थायी लॉकर भी पूरी तरह से फूल हो गए हैं. जिसे देखते हुए अब जो लोग आ रहे हैं उनके लिए पैकेट की व्यवस्था की गई है. जिसपर वो अपना नाम लगाकर विधि पूर्वक अस्थियों को रख रहे हैं.

