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आग से धधकता झरिया राजघराने का वैभव खत्म, सिंह मेंशन व रघुकुल के बीच संघर्ष

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रांची: झरिया भूमिगत आग के कारण एक धधकता शहर. हर चीज पर जहां पड़ी है धूल. पत्ता-पत्ता, दरों दीवारें, हर वो चीज जो दिखती है वो धूल तले है दबी. इस धूल को अब कोई साफ करने की भी नहीं सोचता. धूल यहां की जिंदगी का हिस्सा है. झरिया की जनता धूल खाती है, धूल की ही सांस लेती है. धूल यहां की सियासत पर भी पड़ी है. राजनीतिक सोच और भविष्य पर भी धूल ही है. इस शहर में दाखिल होते ही जिंदगी का उल्लास पर भी मानों धूल पड़ जाती है.

सदियों तक इलाके में राज करने वाले झरिया राजघराने का वैभव खत्म हो जाने के बाद 2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भी लड़ाई दो परिवारों के बीच ही मानों रह गई है. सिंह मेंशन और रघुकुल. दोनों परिवार लोकतांत्रिक मुल्क में जमींदारी प्रथा के वाहक के दौर पर है. जिसकी लाठी में ज्यादा ताकत होगी वही झरिया पर राज करेगा. विधायक कोई भी बने. दोनों दबंग परिवारों का ही नेता होगा. दबंग परिवारों की इस सोच के बीच झरिया के असली राजा जिसने सदियों तक इस इलाके पर राज किया उस राजपरिवार की कहानी भी धूल के नीचे दबी है. लगभग खंडहर में तब्दील हो चुके इस राजमहल की ओर झरिया के लोगों की नजर पड़ती है तो चेहरे पर निराशा और चमक दोनों नजर आती है. निराशा इस महल के वैभव पर धूल पड़ने की और चमक उन पुराने दिनों की जब झरिया का नाम लोग शान से लेते थे.

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झरिया में दाखिल होते ही सड़क की एक तरफ उंचे से टीले पर आज भी ये राजमहल शान से खड़ा है

पुरानी ईंटों पर चूने-गारे का प्लास्टर भले ही झड़ रहा हो लेकिन इस महल ने कभी पूरे इलाके पर राज किया. झरिया राज अंग्रेजों के जमाने में सबसे ज्यादा आमदनी वाली जमींदारी थी. 2019 में इस राज परिवार के झरिया के महल को देखने के बाद झरिया के एक तरह से अंत की कहानी सामने दिखाई देती है. विशाल परिसर में गुंबद आज भी दूर से नजर आ जाता है. मीनारें, मेहराबें और स्तंभ बताते हैं की कभी इस महल का कितना प्रभाव रहा होगा. महल के बाहर हमारी मुलाकात राज परिवार के एक युवा सदस्य शौर्य से हुई. अपने पूर्वजों के इतिहास के खंडहरों पर बैठा 17-18 साल के युवा को देख कोई नहीं कह सकता की कभी इस परिवार के युवराज बिना दरबारियों, अर्दलियों सेवकों के नजर आएगा. इस राजघराने की एक सदस्य माधवी सिंह से फोन पर बात हुई तो झरिया का दर्द सामने आने लगा. माधवी सिंह बताती हैं कि ’’आज झरिया की जनता दबंग परिवारों के बीच पीस रही है. उनके परिवार में गुंडागर्दी की संस्कृति नहीं रही, झरिया के लोगों को यह परिवार बर्बाद कर रहा है.’’ हम महल के अंदर गए. राज परिवार के कई सदस्य अलग -अलग हिस्से में रहते हैं. एक दो महिलाएं भी दिखीं. स्थिति दयनीय दिखी. पालकी जिस पर रानियां सफर करती थीं वो छत पर टंगी थी. मानों कह रही हो कि अब हमारा क्या काम. घर के अंदर की मोटी-मोटी और ऊंची दीवारें बिना रंग रोगन के काली पड़ती जा रही हैं. दीवारों, खिड़कियों पर जाले पड़े नजर आते हैं. इतने बड़े महल की देखभाल आसान नहीं है. ये महल अब झरिया के दर्द की दास्तां बन चुका है. 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की रागिनी सिंह और कांग्रेस की पूर्णिमा सिंह के बीच मुकाबला है. दोनों का संबंध कोयलांचल के सबसे दबंग परिवारों से है. नई पीढ़ी उन्हें ही अपना माई-बाप मानती है. लेकिन झरिया के असली राजा को धीरे-धीरे लोग भूलते जा रहे हैं.

दरअसल झरिया राज की शुरुआत 1763 से शुरु हुई है जब अंग्रेंजो ने जमींदारी रीवा के जयनगर के जमींदारों को सौंप दी. इस वक्त तक कोयला होने की भनक तक नहीं थी. लेकिन 1890 में कोयले ने झरिया को देश का सबसे अमीर जंमीदार बना दिया. राजा दुर्गा प्रसाद सिंह कुशवाहा इस परिवार के सबसे प्रभावशाली राजाओं में थे. राजा दुर्गा प्रसाद सिंह कुशवाहा को राजभार अपने बचपन से ही संभालना पड़ा. 1916 में दुर्गा प्रसाद की मौत के बाद राजा शिव प्रसाद सिंह ने जिम्मेदारी संभाली. झरिया का आरसीपी कॉलेज उनकी ही विरासत है. 1947 में राजा शिव प्रसाद सिंह की मौत के बाद काली प्रसाद सिंह ने गद्दी संभाली और 1952 में जमींदारी प्रथा खत्म होने तक राजा रहे. इस राज परिवार ने इलाके में तालाब, स्कूल और कॉलेज खुलवाने में बड़ी मदद की. आज भी कई संस्थान, निर्माण उस जमाने का इतिहास की कहानी बताते हैं. झरिया भले ही आज दबंग परिवारों की लड़ाई में पीस रहा हो लेकिन किसी जमाने में ’मानभूम’ जिले के झरिया ने वाकई में इलाके का मान बढ़ाया था. हांलाकि झरिया के राज परिवार ने चुनाव में भी अपनी किस्मत आजमाई. राजा कालि प्रसाद ने 1952 में बिहार विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई लेकिन स्वतंत्रता सेनानी और कोयला मजदूरों के नेता पुरुषोत्तम चौहान से हार गए हांलाकि बलियापुर विधानसभा से चुनाव लड़ कर झारखंड पार्टी के टिकट से विधानसभा पहुंचे. 1952 के बाद जैसे इस परिवार ने राजनीति से तौबा कर ली. 6 दशकों तक ये परिवार राजनीति से दूर रहा है. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में माधवी सिंह ने टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड़ कर पॉलिटिकल इंट्री की मगर कामयाबी हासिल नहीं हो सकी. इसी परिवार की स्नेहलता भी राजनीति में है और ओड़िशा में भाजपा के लिए राजनीति करती हैं.

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