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“दिल वहीं लौटना चाहता है जहां हम दुबारा लौट नहीं सकते”……..

"दिल वहीं लौटना चाहता है जहां हम दुबारा लौट नहीं सकते"........

रांची: आज दुबई से मेरी दोस्त ने एक संदेश भेजा,
“दिल वहीं लौटना चाहता है
जहां हम दुबारा नहीं लौट नहीं सकते……..
बचपन, मासूमियत,पुराना घर, पुराने दोस्त……..

क्योंकि,
उम्र चाहे जितनी भी हो सुना है दिल पर कभी झुरियां नहीं पड़ती……….

जब मैंने इस संदेश को पढ़ा तो ऐसा लगा मानो किसी ने सत्य कहा है.
मैं कल धनबाद गई थी. एक बचपन की दोस्त से मुलाकात हुई. जो लंदन में रहतीं है. कुछ ऐसा संयोग बना की हम 25 साल बाद मिले. ऐसा लगा जैसे सारी खुशियां एक ही दिन में इस धरती पर सिमट आई है.
पारुल, हमारी दोस्त वही मासुमियत वही चेहरा वही बचपना बिल्कुल भी नहीं बदली थी. ऐसा लगा मानो हम दोबारा से उसी बचपन में चलें गये हैं. हमारी ये मुलाकात चंद लम्हों की थी पर ऐसा लगा कि हम अपने पुराने दिनों में चले गये हैं पर सच्चाई यह थी कि हम दोबारा अपने पुराने दिनों में नहीं जा सकते थे. बस उन बातों को याद ही कर सकते थे.

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“दोस्त” सच में दोस्तों से बढ़कर दुनिया में कुछ भी नहीं, उस पर बचपन की दोस्ती वो तो होती ही है मासूम निश्छल ना कोई छल कपट ना बनावटीपन.

हम सब दोस्तों की दोस्ती ऐसी जो शायद बहुत कम लोग ऐसी दोस्ती जी पाते हैं. दोस्ती हर कोई करता है सब दोस्त दोस्त ही होते हैं पर हमारी दोस्ती ऐसी जो शायद ना हमने देखी ना सुनी.

आज हम सब उस उम्र में पहुंच गए हैं जहां कभी हमारे मां पापा हुआ करते थे पर आज भी बरसों बाद मिलने पर ऐसा लगता है जैसे हम उसी बचपन में चले गये है. इसका सबसे बड़ा श्रेय जाता है फेसबुक का जिसने हम सब को मिलवाया. नहीं तो ना जाने हम सब किसी शहर में अनजान सा पड़े होते. हम सबकी 8 या 10 लड़कियों का समूह था.

आज हम भले ही अलग-अलग स्थानों पर है कितने सालो से मिले भी नहीं है पर फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए जुड़े हुए हैं. यह बातें उस समय की है जब ना हमारे पास कोई मोबाइल था ना फोन ना टीवी बस रहता था हम सब को शाम के पांच बजे का इंतजार.

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हम सब एक ही कालोनी में रहते थे. ठीक शाम पांच बजे मिला करते थे. तब हम गुली डंडा, लाल इट,आइस पाइस और गेट को विकेट बनाकर क्रिकेट खेला करते थे. सबसे मजा तो तब आता था. जब हम छुट्टियों में भरी दोपहरी में सब दोस्त मिलकर इमली और बेर तोड़ा करते थे. फिर हमारी एक दोस्त जो अब इस दुनिया में नहीं है उसके घर पर इमली पानी और बेर का अचार बनाकर खाया करते थे. उस समय पर हम सब मिलकर सभी त्यौहार को साथ ही मनाया करते थे.

फिर डिस्को का जमाना आया हर जगह पर डिस्को डांस और गाने बजा करते थे फिर हमने सोचा कि हम पीछे क्यों रहे फिर क्या था हम सब ने मिलकर डांस और गाने का प्रोग्राम बनाया रात में हम सब अपने अपने घर से बड़ी वाली टार्च, टेपरेकाडर का इंतजाम किया सबसे बड़ी चुनौती थी. डिस्को लाइट की पर हमने उसमें भी दिमाग लगाया और रंग बिरंगी पारदर्शी कागजों को टार्च के उपर लपेट कर डिस्को लाइट का इंतजाम कर लिया फिर तो हमने जो मस्ती की वो भी क्या दिन थे.

वो दिन भी आया जब हमारे घरों पर टीवी ने दस्तक दी उस समय भी एक या दो घरों में ही टीवी आया था फिर क्या था हम सब मिलकर टीवी के शो का मजा लेते थे. जब टीवी आया तो किक्रेट का भी हमने मजा लिया. उस समय आस्ट्रेलिया और भारत का मैच आया हम सब ने मिलकर एक साथ देखने का प्रोग्राम बनाया उसमें हमारी माएं भी शामिल हो जाती थी. जो भारत को जिताने के लिए कितने नारियल चढ़ाने का भगवान से प्रार्थना करती थीं और भारत के जितने पर चढ़ाया भी करतीं थी. सारी कॉलोनी हम सब की दोस्ती की कायल हुआ करती थी. बातें तो बहुत है पर इस कागज के पन्नों पर लिखना नामुमकिन है.

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समय बदला सभी की शादियां हो गई सब अपने अपने घर में मस्त हो गये. तभी मोबाइल का दौर शुरू हुआ फिर क्या था सबकी कड़ियां जुड़ने लगी. देखते ही देखते हम सब एक दूसरे से जुड़ गए भले हम ना मिले पर आज हम सब साथ है. जब भी मन उदास होता है हम सब अपने पुराने दिनों के बारे में बातें कर कर फिर से रिचार्ज होकर अपने कामों लग जाते हैं.

आज सभी के पास गाड़ी बंगला सारे सुख सुविधाए है पर हमारे बचपन की दोस्ती का वो भोलापन, मासुमियत, निश्छल प्रेम सभी में जिन्दा है.

बिल्कुल सही है कि हम फिर से उस दुनिया में लौटना चाहते हैं पर शायद इस जन्म में अब मुमकिन नहीं……



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