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वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर : स्वामी कल्पनेश

by bnnbharat.com
June 20, 2020
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वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर : स्वामी कल्पनेश

वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर : स्वामी कल्पनेश

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जगदम्बा प्रसाद शुक्ल

प्रयागराज : अवध साहित्य अकादमी एवं तारिका विचार मंच प्रयाग के संयुक्त तत्वावधान में ऑनलाइन विचार प्रवाह संप्रेषण श्रृंखला में ” वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना ” विषय पर विचारों का सार्थक प्रवाह प्रस्फुटित हुआ.  अपने विचारों का अमृतमय प्रसाद अर्पित करते हुए संत साहित्यकार स्वामी कल्पनेश जी महाराज ने कहा कि वर्तमान काव्य में राष्ट्रीय चेतना
वर्तमान काव्य साहित्य में कूट-कूट कर भरी हुई है.
जब कभी राष्ट्रीय चेतना पर आक्षेप-प्रक्षेप अथवा आघात-प्रत्याघात हुआ है केवल हिंदी काव्य ही नहीं वरन भारत की जितनी भी भाषाएँ हैं सब में जो साहित्य रचा गया, राष्ट्रीय चेतना के सापेक्ष बातें उभर कर आयीं हैं. आदिकाल से अद्यतन साहित्य में यह प्रचुरता से द्रष्टव्य है. पाक या चीन की सीमा की बातें हों अथवा कोरोना जैसी महामारी, जिससे भी हमारी राष्ट्रीय चेतना पर आघात होता है कवियों की कलम खुद ब खुद व्यग्र हो उठती है.
उपभोक्ता वादी संस्कृति का प्राबल्य होने की वजह से कलम की धार कुछ मंद दिखाई पड़ रही है. संप्रति कोलकाता में प्रवास कर रहे सुप्रसिद्ध साहित्यकार गीतकार एवं समीक्षक डॉ डॉक्टर त्रिलोकी सिंह ने कहा कि देश के हर नागरिक में राष्ट्र के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना तो होनी ही चाहिए, भले ही वह किसी भी जाति, धर्म और संप्रदाय का हो. इस भावना को जनमानस में पल्लवित – पोषित एवं जागरित करने हेतु काव्यकारों की भूमिका बढ़ जाती है. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्हें ऐसे काव्य- सर्जन को प्रमुखता देनी चाहिए , जो देशवासियों को सचेत करते हुए उनके मन में राष्ट्रीय चेतना की भावना को उद्दीप्त कर सके, जिससे वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए देश के प्रति अपने आवश्यक दायित्व का समुचित निर्वहन कर राष्ट्र के लिए आत्मोत्सर्ग करने को सहर्ष उद्यत हो सकें.
साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षर ज्ञानेंद्र विक्रम सिंह रवि ने भी अपनी बात इस तरह रखी..
हिन्दी कविता और कवियों के राष्ट्रीय रिश्ते इन दिनों मजबूत हुए हैं. वैसे बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के साथ कवियों के तेवर पहले भी बदलते रहे हैं और कविता की धार भी समय के साथ तेज होती रही है. इन दिनों देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया है.
देश के ख्याति लब्ध साहित्यकार पत्रकार एवं अभिव्यक्ति के संपादक डॉ अनिल शर्मा अनिल ने अपना विचार साझा करते हुए कहा कि वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर है. राष्ट्रप्रेम, देशोत्थान, जीवन मूल्यों के संरक्षण, कुरीतियों पर प्रहार और प्रगति हित सुझाव कवियों के मुख्य सृजन बिंदु रहे हैं. इन दिनों वैश्विक संकट कोरोना के काल में आया काव्य साहित्य, कवियों के कविधर्म और राष्ट्रीय चेतना का उत्कृष्ट उदाहरण है.
राष्ट्रवादी कवि और मंच के सशक्त हस्ताक्षर बबलू सिंह बहियारी ने अपनी बात कुछ यूं कहीं
वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीयता परवान चढ़ी है
प्राचीन काल से ही राष्ट्र शब्द हमारी चेतना में विकसित रहा है। यद्यपि यह भावना साहित्य के माध्यम से हमारे मस्तिष्क में गुलामी के दौरान प्रगाढ़ हुई।
कबीर, तुलसीदास, भूषण की रचनाधर्मिता से बढ़ते हुए यह परंपरा आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र तक आकर समृद्ध होती चली गई।
संक्षेप में कहें तो तो रामधारी सिंह दिनकर की राष्ट्रीय चेतना की धारा वर्तमान में भी अविरल कल – कल करते हुए सुप्त और निरासित समाज को ऊर्जा दे रही है।
वर्तमान काव्य साहित्य में राष्ट्रीय चेतना हमारे राष्ट्र की संस्कृति, संस्कार, मातृभूमि, मातृभाषा इत्यादि अनेक रूपों में अलग – अलग शैली में रचनाकारों द्वारा प्रज्वलित है।
वर्तमान में हरिओम पंवार, विनीत चौहान, ओमपाल निडर आदि श्रेष्ठ कवि राष्ट्रीय चेतना की मशाल को अग्नि रूपी ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
एक पंक्ति में इशारों से कहना चाहता हूं –
“दरकते स्वप्न में तुम पाषाण सा विश्वास भर देना… विचार प्रवाह श्रृंखला में जो तथ्य उभरकर सामने आए उसे से स्पष्ट है कि वर्तमान का विजेता ना राष्ट्रीयता से ओतप्रोत है और नए पुराने सभी साहित्यकार राष्ट्रप्रेम की अलख जगाने में अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग कर रहे हैं.

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