ग़ज़ल
मुझ पे इल्ज़ाम लगाने से भला क्या हासिल
अपनी क़ीमत को बढ़ाने से भला क्या हासिल
सच कहो बात अगर तुम तो कोई बात बने
झूठे अशआर सुनाने से भला क्या हासिल
मसअला घर का मोहब्बत से सुलझना अच्छा
बीच दीवार उठाने से भला क्या हासिल
मुझको दिल से तो भुलाया नहीं अब तक हमदम
मेरी तस्वीर जलाने से भला क्या हासिल
साथ रहते हुए भी साथ नहीं हैं जब हम
ज़िंदगी साथ बिताने से भला क्या हासिल
बलजीत सिंह बेनाम


