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किससे डरते हैं राज्यसभा सांसद और पूर्व CJI रंजन गोगोई

नई द‍िल्‍ली : राज्यसभा सांसद रंजन गोगोई ने दावा किया है कि एक ‘लॉबी’ के चलते न्यायिक स्वतंत्रता पर खतरा है. उन्होंने कहा कि आधा दर्जन लोग ऐसे हैं, जो जजमेंट उनके पक्ष में नहीं आने पर जजों की छवि खराब करने की कोशिश करते हैं.

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब है कि इसके ऊपर बैठे आधा दर्जन लोगों के शिकंजे को खत्म करना है. जब तक यह शिकंजा खत्म नहीं होगा, तब तक न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं हो पाएगी. वे जजों को फिरौती देने के लिए पकड़ते हैं. अगर कोई फैसला उनके मन मुताबिक नहीं आता तो वह जज की छवि को खराब करने की हरसंभव कोशिश करते हैं. मैं यथास्थितिवादी न्यायाधीशों के लिए डरता हूं, जो उनका सामना नहीं करना चाहते हैं और जो शांति से सेवानिवृत्त होना चाहते हैं.

गोगोई ने उस आलोचना को भी खारिज कर दिया जिसमें विभिन्न नेता कह रहे थे कि उन्हें राज्यसभा सदस्यता, फैसलों की वजह से मिली है.

उन्होंने कहा कि मेरी निंदा इसलिए हो रही है क्यों मैंने लॉबी को खारिज कर दिया. अगर एक जज अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार मामले का फैसला नहीं करता तो वह अपनी शपथ के साथ न्याय नहीं कर रहा है. अगर कोई जज फैसला इस आधार पर करेगा कि आधा दर्जन लोग क्या कहेंगे तो वह शपथ के साथ अन्याय कर रहा है. मेरी अंतरात्मा ने मुझे जिस ओर दिशा दी मैंने वह फैसला किया. अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो मैं एक न्यायाधीश के रूप में उचित नहीं हूं.

साल 2018 की प्रेस वार्ता का जिक्र करते हुए गोगोई ने कहा,

‘जब मैंने जनवरी 2018 में प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो मैं लॉबी का प्रिय था. लेकिन वे चाहते हैं कि जज एक निश्चित तरीके से केस तय करें और उसके बाद ही वे उन्हें ‘स्वतंत्र जज’ के रूप में प्रमाणित करेंगे. मैंने कभी यह महसूस नहीं किया कि अदालत के बाहर कुछ अपेक्षा है. मुझे जो सही लगा, मैंने किया अन्यथा मैं एक जज के तौर पर सही काम नहीं कर रहा हूं.’

‘दूसरों की राय से कभी नहीं डरा’

पूर्व CJI गोगोई ने कहा, ‘दूसरों की राय से (पत्नी को छोड़कर) ना कभी डरा था, ना डरता हूं और ना ही डरूंगा. मेरे बारे में दूसरों की राय क्या है, यह मेरी नहीं बल्कि उनकी समस्या है और इसे उन्हें ही हल करना है.

अयोध्या फैसले पर गोगोई ने कहा,

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‘यह पांच न्यायाधीशों की बेंच का सर्वसम्मत निर्णय था. राफेल भी तीन जजों की बेंच का निर्णय था. क्या वे सभी न्यायाधीशों की निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं?’

उन्होंने कहा कि ‘न्यायाधीशों ने ‘लॉबी’ द्वारा अपशब्दों के प्रयोग के कारण चुप रहना पसंद किया.

पूर्व CJI ने कहा, ‘मैं आज चुप नहीं रहूंगा.’ राज्यसभा सांसद के लिए नामित होने पर उपजे विवाद और विरोध पर गोगोई ने कहा, ‘यदि कोई पूर्व CJI प्रो क्विड चाहता है, तो वह बड़े लाभ और सुविधाओं के साथ बड़े आकर्षक पदों की तलाश कर सकता है, न कि राज्यसभा का नामांकन. मैंने फैसला किया है कि अगर नियम अनुमति देता है, तो मैं राज्यसभा से वेतन और भत्ते नहीं लूंगा और छोटे शहरों में लॉ कॉलेजों के पुस्तकालयों को रेनोवेट करने के लिए दे दूंगा.’

2G मामले में यह लॉबी चुप क्यों थी?

सीलबंद रिपोर्ट मंगाए जाने के मुद्दे पर गोगोई ने कहा, ‘क्या हमें राफेल जेट से जुड़े हथियारों से संबंधित संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए थी? पाकिस्तान दिल खोलकर हंसता और कहता कि उसने सर्वोच्च न्यायालय के जरिए भारत को पीछे छोड़ दिया. और क्या राफेल सौदा मूल्य निर्धारण के बारे में समान स्तर की पारदर्शिता की मांग के लिए एक साधारण सड़क निर्माण याचिका की जांच थी?’

जब सुप्रीम कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम के अनियमित आवंटन से संबंधित मामले को सीलबंद कवर रिपोर्ट के जरिए निपटाया था, तो यही लॉबी चुप क्यों थी? जब शाहीन बाग विरोध पर सुप्रीम कोर्ट को सीलबंद कवर रिपोर्ट दी गई तो वे चुप क्यों हैं? इस पर सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा है?’

राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा सदस्य के रूप में अपने नामांकन पर, गोगोई ने कहा, ‘यह प्रस्ताव एक सप्ताह पहले एक व्यक्ति द्वारा आया था जो न्यायपालिका या सरकार से जुड़ा नहीं है. क्या एक पूर्व CJI, जिसने संवैधानिक न्यायाधीश के रूप में 20 साल बिताए हैं, वह संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राज्यसभा के लिए नामांकित होने के लिए उपयुक्त नहीं है जहां राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर चुनाव करता है? किस तरह से एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश नामांकन स्वीकार करके न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता करता है?’

पूर्व CJI से जब पूर्व सहयोगियों जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ द्वारा उनकी आलोचना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘जब मैं एक सिटिंग जज था तब मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लिया था. आज संतोषजनक ढंग से (मेरी संतुष्टि) एक जज के रूप में मैंने अपनी भूमिका पूरी की, अगर मैं राज्यसभा के लिए नामांकन स्वीकार करता हूं, तो न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता करने का सवाल ही कहां है?’

साभार : इंड‍ि‍या टुडे

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