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ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर नारी गरिमा का हो रहा मानमर्दन, अविलम्ब रोक लगाये सरकार रू महेश पोद्दार

by bnnbharat.com
January 21, 2021
in समाचार
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राज्यसभा सांसद ने केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री को लिखी चिट्ठी, कहा- अपसंस्कृति रोकना जरुरी

रांची :-ाज्यसभा सांसद   महेश पोद्दार ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर प्रयोग में लायी जा रही आपत्तिजनक भाषा एवं विषयवस्तु पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए सरकार से अविलम्ब इस पर रोक लगाने की मांग की है. पोद्दार ने इस आशय का एक पत्र केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री  प्रकाश जावडेकर को लिखा है.

केन्द्रीय मंत्री को लिखे पत्र में पोद्दार ने कहा है कि वेब सीरिज “तांडव” के देशव्यापी विरोध ने ये प्रमाणित कर दिया है कि देश का आम जनमानस मनोरंजन के नाम पर अपनी सभ्यता-संस्कृति-मान्यताओं के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है.देश का एक बड़ा वर्ग धार्मिक दृ सांस्कृतिक कारणों से इसका विरोध कर रहा है. लेकिन इसके साथ ही . पोद्दार ने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध सामग्री द्वारा भारतीय सामाजिक मूल्यों पर हो रहे आघात को लेकर चिंता जतायी है. 

उन्होंने कहा है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की भाषा और कंटेंट में सेक्सुअल डिस्क्रिमिनेशन अथवा जेंडर डिस्क्रिमिनेशन साफ झलकता है.एक तरफ तो हम स्त्रियों की अस्मिता की रक्षा के लिए खुद को प्रतिबद्ध बताते हैं, दूसरी तरफ हमें सार्वजनिक माध्यमों पर मां-बहन की गालियां उपलब्ध करायी जा रही है, स्त्री दृपुरुषों के जननांगों की चर्चा सार्वजनिक तौर पर वीभत्स रूप में की जा रही हैद्य निजी बोलचाल में संभव है कि इस तरह की भाषा का इस्तेमाल होता होद्य लेकिन सार्वजनिक तौर पर उसकी चर्चा से जुडी कई वर्जनायें हैं और दरअसल उसे ही हम हया, शर्म, लज्जा, मर्यादा आदि का नाम देते हैं क्योंकि ये स्थापित मान्यता है कि सभ्य समाज की ये भाषा नहीं है.

भाषा कोई भी हो, हिन्दी, अंग्रेजी या कोई अन्य भाषाद्य यह भी गौर करने योग्य है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील-फूहड़ भाषाओं के इस्तेमाल के क्रम में नारी गरिमा को ही तार-तार किया जाता है.कंटेंट ऐसा होता है, भाषा ऐसी होती है मानों तय कर लिया गया है कि पुरुष भोगी है और नारी भोग्याद्य “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” की भावना वाले देश में ऐसी विषयवस्तु और भाषा कैसे स्वीकार्य हो सकती है?

. पोद्दार ने कहा कि देश की संसद में, यदि कोई शब्द या वाक्य आपत्तिजनक प्रतीत होता है तो फौरन ये आवाजें उठती हैं कि यह शब्द या वाक्य असंसदीय है और उसे कार्यवाही से निकाल दिया जाना चाहिए. संसद के सदस्य एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और जब सार्वजनिक जीवन में एक क्षेत्र विशेष या आबादी के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करनेवाला जन प्रतिनिधि, उस सभा में जिसके सारे सदस्य उसी की तरह अलग-अलग क्षेत्रों या आबादी के एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करनेवाले होते हैं, जिन शब्दों या वाक्यों का प्रयोग नहीं कर सकता, उन्हीं या वैसी ही भाषा का प्रयोग सूचना या मनोरंजन के नाम पर आम लोगों को परोसने की अनुमति किसी संचार माध्यम को कैसे दी जा सकती है? जो भाषा संसदीय नहीं है वह सार्वजनिक जीवन के अनुकूल और किसी सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर विक्रय योग्य, वितरण योग्य, प्रसारण योग्य कैसे हो सकता है?

पोद्दार ने कहा कि अब समाज का जागरूक और मर्यादित वर्ग इस प्रक्रिया में विलम्ब को अत्यधिक नुकसानदेह मान रहा हैद्य यह अनुकूल अवसर है जब भारत सरकार अपसंस्कृति और नारी गरिमा के मानमर्दन को रोकने में ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैद्य उन्होंने यथाशीघ्र और प्रभावी तरीके से ओटीटी प्लेटफॉर्म्स सहित इन्टरनेट पर उपलब्ध सूचना और मनोरंजन के सभी माध्यमों की प्रसारण सामग्री को सभ्य समाज और नारी गरिमा के अनुकूल मर्यादित बनाने की मांग की है.

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