SACH KE SATH

सत्य के उत्तर काल में जब झूठ, सच पर इस कदर हावी हो गया कि सच और झूठ का हर अन्तर समाप्त हो चुका है

सत्य के उत्तर काल में जब झूठ, सच पर इस कदर हावी हो गया कि सच और झूठ का हर अन्तर समाप्त हो चुका है। और हर भक्त अपने ही बुने भँवर जाल में फ़ँस कर बिल्कुल कन्फ्यूज़्ड हो चुका है और उसे यह तक भी याद नहीं कि किस सच के बदले कौन सी झूठ फैलाई गई थी। इसी ऊहापोह और उधेड़बुन से निकलने के लिए, भक्त व्हाटस ऐप्प और फेसबुक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के पास नहीं बल्कि किताबों से अर्जित शिक्षाविद् और ज्ञानी के पास पहुँचता है।
भक्त: महाराज, मुझे सच और झूठ का यथार्थ दर्शन कराएँ।महाराज : वत्स, सच और झूठ को समझने के लिए पहले यह चश्मा हटाना पड़ेगा, अन्धविश्वास वाला। ये हटाए बगैर दर्शन नामुमकिन है।भक्त: महाराज, यह बहुत ही मुश्किल काम है। बहुत मेहनत लगता है भक्त बनने में। पहले जो कुछ सीखा है उसे भूलना पड़ता है और जो भूलने लायक है वो ही सब सीखना पड़ता है। इन सब को सीखने में मूर्खता और अतार्किक्ता का छौंक लगाना पड़ता है और रोज़ बच्चे की तरह सुबह शाम दूध के जैसे पीना पड़ता है। और एक बार भक्त बन जाने पर दूसरों का सच भी झूठ लगने लगता है और उसके बाद यह चश्मा हटाए नहीं हटता। लेकिन आपके लिए यह कोशिश मैं कर के देखता हूँ।महाराज: बहुत बढ़िया। अच्छा अब बताओ कि तुम्हारे अनुसार झूठ क्या होता है।भक्त: महाराज, झूठ वही होता है जो सच नहीं होता।महाराज: अच्छा तो फिर बताओ कि प्रजातंत्र में जनता सर्वोपरि होती है, यह सच है, झूठ है या सच जैसा दिखने वाला झूठ है।भक्त: महाराज, संविधान की प्रस्तावना के अनुसार तो यह बिल्कुल सत्य है कि  प्रजातंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। लेकिन नेताओं के सामने जनता को गिड़गिड़ाते और आँख डबडबाते देखकर यह बिल्कुल झूठ लगता है। फिर तो कुल मिलाकर मुझे यह कथन सच जैसा दिखने वाला झूठ ही प्रतीत होता है।महाराज: लगता है कि अब तुम्हारी अन्धभक्ति कुछ हद तक कम होती जा रही है।भक्त: लेकिन महाराज, मैंने तो यह भी सुना है कि सच हमेशा सच होता है चाहे वह कोई भी युग हो, काल हो, समय हो या परिस्थिति हो।महाराज: ऐसी बात है तो यह बताओ कि  सच बोलना सबसे अच्छी नीति है और सच बोलने वालों की हमेशा जीत होती है, क्या यह चिर कालीन सत्य है?भक्त: यह बिलकुल चिर कालीन सत्य है,महाराज। इस में मुझे अंश भर का भी संदेह नहीं।मेरे बाप ,दादा भी यही कहते थे। मैने अपने स्कूल,कॉलेज,यूनिवर्सिटी में भी यही पढ़ा है। और तो और हर सरकारी दफ्तर, पुलिस स्टेशन, कोर्ट, कचहरी में भी गाँधी जी की फोटो के नीचे यही लाईन लिखी देखी है। और मैंने तो कई राजनेताओं को भी गाँधी जी का यही वाक्य दोहराते देखा है और सफलता की असीम गहराइयों में उतरते भी देखा है।महाराज: तो वत्स, फिर यह कैसे होता है कि कई सच के पुजारी जेल में डन्डे खाते पाए जाते हैं और कई झूठ के कारोबारी हर सुख भोगते नज़र आते हैं।भक्त: महाराज, आपकी बात तो बिलकुल सत्य है। इस सच और झूठ के घालमेल में से सत्य को खोज के निकालना किसी सिद्धहस्त ग्वाले के दूध में दूध खोजने जितना कठिन काम दिख रहा है।तो क्या महाराज सच या झूठ सब एक ही हैं ?महाराज: वत्स, सच और झूठ स्वयं में कुछ नहीं होता। अश्वत्थामा मारा गया, यह किसी के सत्य था तो किसी के लिए उतना ही झूठ। सच और झूठ अपनी सुविधा के अनुसार बनाए जाते हैं, नए कलेवरों में बाँध कर बेचे जाते हैं और अखबार,रेडियो,टेलीविजन, किताब, सोशल मीडिया के जरिए बस, ट्रेन, ऑफिस, पार्क, रोड़,मॉल और अमूमन हर जगह फैलाए जाते हैं। हर एक का अपना सच और अपना झूठ होता है। सच भी कितना सच है या झूठ भी कितना झूठ है यह कहने वाले ,सुनने वाले के अलावे जो इसको फैला रहा है, उस पर भी बहुत निर्भर करता है। सच या झूठ के आँकड़े कभी स्वयं नहीं बोलते, बल्कि उन से वही बुलवाए जाते हैं जो शासक चाहता है। ये स्कूल, कॉलेज,धर्म, अस्पताल, शिक्षा, व्यवसाय, मीडिया, नीति, शास्त्र इस सच और झूठ को फैलाने के केवल साधन मात्र हैं,और कुछ भी नहीं। और प्रजातंत्र में शासक और शासित का सच हमेशा अलग होता है।भक्त: महाराज, शासक और शासित के सच में क्या अन्तर होता है?महाराज: वत्स, शासक का सच यह है कि वह येन केन प्रकारेण शासन करना चाहता है फिर विधि कोई भी हो मायने नहीं रखती। और शासित का सच यही है कि उसे अपने शासक के सच को ढ़ोना पड़ता है। प्रजातंत्र किसी फैंसी पालतू जानवर की तरह है, जिसके सुनहरे बाल और चमकदार काया समाज के रसूखदार की तरह होते हैं ,जिसे सब प्यार करते हैं और उन सुनहरे बालों के नीचे दबा हुआ घाव उसी समाज के मजलूम वर्ग को दर्शाता है, जिसे देख कर सिर्फ घिन्न आती है।वत्स: तो क्या महाराज, जनता का कोई सच होता ही नहीं!महाराज: जनता का एक मात्र सच जो है वो उसकी अन्तिम यात्रा या कब्रिस्तान या शमशान घाट में दिखता है-मौत। मौत का कोई झूठ नहीं होता। और पूरे संसार का एक मात्र चिर कालीन सत्य भी यही है।


सलिल सरोज

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