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ब्राह्मण कुमार की कथा : विक्रम और बेताल – 18

by bnnbharat.com
December 27, 2022
in छोटी कहानियाँ, भाषा और साहित्य, विक्रम और बेताल, समाचार
ब्राह्मण कुमार की कथा : विक्रम और बेताल – 18

ब्राह्मण कुमार की कथा : विक्रम और बेताल – 18

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बेताल का पीछा करते हुए राजा विक्रामादित्य शिशपा वृक्ष के पास पहुंचे और किसी तरह बेताल को अपने कंधे पर उठाकर आगे बढ़ने लगे। पहले की तरह ही बेताल रास्ता बड़ा होने की वजह से राजन को कहानी सुनाने लगता है। बेताल कहता है…

सालों पहले की बात है, जब उज्जैन नगर में राजा महासेन राज किया करता था। उसी राज्य में एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम वासुदेव था। उसका एक ही बेटा था, गुणकार। नाम का तो वह गुणकार था, लेकिन उसमें कोई गुण नहीं था। वो दिन रात बस जुआ खेलता था। जुए में वह पिता के कमाए सारे पैसे हार जाता। उसकी दो बहन भी थीं। उसे उनका भी ख्याल नहीं था। वो बस दिन-रात जुआ खेलने में ही व्यस्त रहता।

अपने बेटे का ऐसा हाल देखकर ब्राह्मण बड़ा परेशान हो गया। एक दिन वासुदेव ने सोचा, मैं जो भी कमाता हूं, उसे भी यह जुएं में उड़ा देता है। यही सोचकर उसने अपने बेटे गुणकार को घर से निकाल दिया। घर से निकलते ही वह दूसरे राज्य पहुंच गया। वहां वह भूखा-प्यासा घूमता रहा, न तो उसे कोई काम मिला और न ही कुछ खाने के लिए। ऐसा होते-होते वह एक दिन बेहोश हो गया। पास से ही गुजर रहे एक सिद्ध पुरुष ने उसे देखा, तो उसे अपने साथ गुफा में ले आए। होश में आने के बाद योगी ने लड़के से पूछा, “क्या खाओगे।” ब्राह्मण पुत्र कहता है, “आप योगी हैं, आपके पास जो होगा आप वही खिला पाएंगे। मैं जो खाना चाहता हूं, शायद वो आपके पास न हो।” इतना सुनते ही योगी ने कहा, “तुम बस बताओ, तुम्हें क्या खाने की इच्छा है।”

इतना सुनने के बाद गुणकार ने अपनी इच्छा जाहिर की, जिसे सुनते ही योगी ने अपनी सिद्धि की मदद से उसकी मनपसंद थाली प्रकट कर दी।

वह लड़का हैरान रह गया, पहले उसने खान खाया और फिर सिद्ध पुरुष से पूछा, “यह चमत्कार आपने कैसे किया।” योगी ने कुछ कहा नहीं, बस अंदर की ओर जाना का इशारा किया। वह जैसे ही अंदर गया, तो उसे बड़ा सा महल और दासियां दिखाई दीं। सब ने उसकी अच्छे से सेवा की और वह आराम से सो गया।

सोकर उठने के बाद उसने सिद्ध पुरुष से दोबारा वही प्रश्न किया। योगी ने कहा, “इससे तुम्हें क्या करना है, तुम यहां कुछ दिन मेहमान की तरह रहो और व्यवस्था का आनंद उठाओ।” ब्राह्मण पुत्र जिद में अड़ गया और कहने लगा कि वो भी यह सिद्धि हासिल करना चाहता है। परेशान होकर योगी ने उसे विधि बता दी और कहा कि जाओ अब मन लगाकर साधना करो।

कुछ समय बाद वह साधना पूरी करके आ जाता है। फिर योगी कहता है, “तुम सब कुछ बहुत सही तरीके से कर रहे हो। यह पहला पड़ाव था, जिसे तुमने पार किया है। अब तुम्हें दूसरे पड़ाव की ओर बढ़ना होगा।” उसने कहा, “मैं, ऐसा ही करूंगा, लेकिन दूसरा पड़ाव शुरू करने से पहले मैं एक बार अपने घर जाना चाहता हूं।” सिद्ध योगी ने कहा, “जाओ, जरूर जाओ।” जाने से पहले ब्राह्मण पुत्र ने योगी से अपने परिवार के लिए तोहफे की मांग की। योगी ने अपनी सिद्धि से उसे खूब सारे तोहफे दिए। उसके बाद उसने पैसों की मांग की, सिद्ध पुरुष ने अपनी विद्या के दम पर उसे खूब सारा पैसा भी दिया। उसके बाद उसने अपने लिए अच्छे से कपड़े मांगे, योगी ने उसे वो भी दे दिए।

सब कुछ लेकर वह अपने घर पहुंचा, तो उसके परिवार के सभी लोग गुणकार को देखकर दंग रह गए। साथ लाए तोहफे और धन को देखकर उसके ब्राह्मण पिता ने पूछा, “बेटा कहीं तुमने कोई चोरी तो नहीं की है न।” गुणकार ने बड़े गर्व से कहा, “पिताजी मुझे कुछ ऐसा प्राप्त हो गया है, जिसकी मदद से मैं अब सबकी हर इच्छा पूरी कर सकता हूं।” उसके पिता ने गुणकार को संभल कर रहने और अहंकार न करने की सलाह दी। कुछ दिन घर में बिताने के बाद गुणकार दोबारा सिद्ध पुरुष के पास लौट गया।

वहां लौटकर उसने दोबारा से साधना शुरू की। बड़ी लगन से वह ध्यान करने लगा। समय के साथ-साथ ब्राह्मण पुत्र ने दूसरा पड़ाव भी पूरा कर लिया। पड़ाव पूरा होने के बाद उसे भी वह विद्या हासिल हो गई। योगी के पास जैसे ही वह विद्या हासिल करके पहुंचा, तो सिद्ध पुरुष बहुत प्रसन्न हुआ। उसने गुणकार से कहा, “तुमने अब विद्या हासिल कर ली है, आज तुम मुझे कुछ भोजन खिलाओ। मुझे भूख लगी है।” यह सुनते ही ब्राह्मण पुत्र बेहद खुश हुआ और सिद्धि की मदद से मन चाहा भोजन हासिल करने के लिए मन में मंत्र पड़ने लगा। काफी देर हो गई, लेकिन भोजन सामने नहीं आया। वह बहुत क्रोधित हुआ और चिल्लाने लगा, मेरी विद्या काम क्यों नहीं कर रही है। मैंने भी सिद्धि हासिल की है, उसका फल मुझे क्यों नहीं मिल रहा है?

इतनी कहानी सुनाते ही बेताल चुप हो गया और राजा से पूछने लगा, बताओ इतने मन से पूरी विधि करने के बाद भी उसे सिद्धि हासिल क्यों नहीं हो पाई। विक्रमादित्य कहते हैं, बेताल! सबसे पहला कारण, तो यह है कि वह विद्या हासिल करने से पहले ही घर चला गया। उसके बाद वह विद्या लालच की वजह से हासिल करना चाहता था। लालच के चलते की गई चीजों का फल कभी प्राप्त नहीं होता है। सिद्धि हासिल करने के लिए व्यक्ति को बिना लालच के कर्म करना पड़ता है।

शिक्षा: हमें कभी भी विद्या हासिल करने का फैसला लालच की वजह से नहीं करना चाहिए और विद्या पर अहंकार हो जाए, तो वह समय पर काम नहीं आती।

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