SACH KE SATH

दोषारोपण बनाम समाधान (परवरिश: अभिभावक से दोस्त तक-03)

राहुल मेहता,

रितिका पढ़ने में औसत थी. अपनी ओर से पूरी मेहनत करती, परन्तु परिणाम मेहनत के अनुरूप नहीं आता. उसे समझ में नहीं आता कि गड़बड़ी आखिर हो कहां रही है. उसने हमेशा लगता कि अंक कम आयें हैं. उसने जानने का प्रयास भी किया. वर्ग की शिक्षिका हो या उसके शिक्षक पिता, दोनों उसके समस्या का समाधान करने के बजाए उसे ही नसीहत दे डालते- “और ज्यादा मेहनत करो”. पिता तो साथ में जोड़ देते- ‘जितना गुड़ डालोगी खीर उतना ही मीठा होगा न’. रितिका मायूस हो बुदबुदा कर रह जाती. बड़ों के सम्मान के फेर में उसका हौसला और पस्त हो जाता.

तमाम प्रयासों के बावजूद नवीं कक्षा में उसके दो विषयों में नंबर कम आए और उसे विद्यालय बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह उसके लिए बहुत बड़ा अपमान और सदमे से कम नहीं था. रितिका के लिए मुद्दा ‘दोस्तों से बिछुड़ना नहीं, बल्कि दोस्तों को कैसे मुंह दिखाया जाए’ था. परंतु उसके अभिभावकों ने उसकी मनोदशा समझी ही नहीं. उनकी समस्या अलग ही थी. उन्हें लगता था कि रितिका ने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी. इन सभी का परिणाम अत्यंत दुखद हुआ. रितिका एक दिन अपने अभिभावकों के ताने के बाद खुद को संयमित नहीं रख पायी और हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह चिरनिंद्रा में सो गयी.

  • रितिका के दुखद अंत के लिए जिम्मेदार कौन थे- वह खुद, अभिभावक, शिक्षक या सभी?
  • क्या ऐसी घटना आपके आसपास घटी है? बेशक हर घटना की परिणति ऐसी दुखद न हुई हो?
  • रितिका की परवरिश भी क्या इसके लिए जिम्मेवार नहीं?
  • क्या इस घटना को रोका जा सकता था? यदि हाँ तो कैसे?

किशोरावस्था परिवर्तन का समय होता है. शारीरिक परिवर्तनों के कारण किशोर ऐसे भी तनाव में रहते हैं. यदि शैक्षणिक या अन्य बाह्य समस्या जुड़ जाती है तब समस्या और जटिल हो जाती है. बेहतर परवरिश का एक प्रमुख उद्देश्य है बच्चों के समस्याओं को समझ कर उनके समाधान का राह प्रशस्त करना. सफल प्रयास वही होता है जो किशोरों के आवश्यकताओं और भावनाओं के अनुकूल हो न कि अभिभावकों के आकांक्षाओं के अनुरूप.

किशोरों के परवरिश में अभिभावकों की कुछ जानी-अनजानी गलतियां

किशोरों के साथ वार्तालाप में कुछ अभिभावक उनके दोषों को ऐसे खोद-खोद कर उजागर करते हैं जैसे उद्देश्य उन्हें गलत साबित करना ही हो और जब तक वह ऐसा नहीं कर लेते, शायद उनके अहं की तुष्टी नहीं होती. लेकिन उनका प्रयास अहं की तुष्टिकरण नहीं, बल्कि किशोरों के गलतियों में सुधार होना चाहिए. जब उद्देश्य बदल जाता है तो प्रयास की दिशा स्वतः बदल जाती है. अभिभावकों द्वारा ऐसी ही कुछ  प्रमुख जानी-अनजानी गलतियां निम्नलिखित हैं-

  • आवश्यकता से ज्यादा उम्मीद: कुछ अभिभावक बच्चे के योग्यता और रुची के अनुरूप नहीं बल्कि अपने आकांक्षाओं और सामाजिक हैसियत के अनुरूप उम्मीद पाल लेते हैं.
  • नकारात्मक उम्मीद: कुछ अभिभावकों के लिए किशोर तभी ‘अच्छे’ हैं, यदि वे ‘खराब’ कार्य नहीं करते. नकारात्मक अपेक्षाएं परोक्ष रूप में उस व्यवहार को बढ़ावा दे सकती हैं जिससे अभिभावक सर्वाधिक डरते हैं.
  • दुसरे के बातों में आकर प्रयास करना: हमारे समाज में यदि कोई सपने समस्याओं को साझा करता है तो श्रोता तुरंत विशेषज्ञ बन जातें हैं, बिन माँगे थोक में सलाह मिल जाती है. समस्या तब जटिल हो जाती है जब अभिभावक समस्यायों का कारण, परिस्थिति और अपने व्यवहार की भूमिका समझे बिना “उपदेशों” का अनुपालन करने लगते हैं.
  • अति संरक्षण या उपेक्षा: बेहतर परवरिश के लिए दोनों बाधक हैं. यदि अभिभावक किसी अनजाने खतरा या असफलता के भय से किशोरों की मदद करते हैं तो यह समस्या को और गंभीर बना सकता है.
  • पूर्वाग्रह पूर्ण अपेक्षाएं: यदि अभिभावक को लगता है कि उनका बच्चा “कुछ” कार्य (सकारात्मक जैसे वर्ग में प्रथम आना या नकारात्मक जैसे आत्महत्या) कर ही नहीं सकता तो यह उनके लक्ष्य, प्रयास और अनुश्रवण को प्रभावित करती है, जो बच्चे के लिए हितकर नहीं होता है.
  • बहुत ज्यादा या बहुत कम अनुशासन: कितना अनुशासन उचित है यह किशोर के उम्र, उसके स्वभाव, व्यक्तित्व और परिस्थिति पर निर्भर करती है. बहुत ज्यादा और बहुत कम अनुशासन दोनों नुकसानदायक होते हैं.
  • लैंगिक भेद-भाव: सामाजिक मानदंडों के परिवेश में कुछ माता-पिता बेटा और बेटी के परवरिश में भेद करते हैं. यदि वे पुत्र के व्यवहार को नजरंदाज करते हैं तो पुत्री पर अनेक पाबंदियां भी लगाते हैं.
  • जटिल समस्याओं को टालना: किशोरावस्था में प्रयोग सामान्य है- चाहे अपने शरीर के साथ हो या, नयी जानकारी और संबंध से संबंधित, विशेषकर सेक्स संबंधी. अधिकतर अभिभावक सामाजिक वर्जनाओं के फेर में इन मुद्दों पर किशोरों का सही मार्गदर्शन नहीं करते या करना ही नहीं चाहते.

 किशोरों के परवरिश में अभिभावकों की भूमिका:

  • बच्चे को सुधारने के बदले बच्चे के व्यवहार में सुधार पर ध्यान देना.
  • किशोर के साथ अभिभावक और एक दोस्त सा व्यवहार करना.
  • किशोर के समस्याओं और उनके मनोदशा पर निरंतर नजर बनाये रखना, विशेषकर कठिन समय में.
  • आरोपित करने के बजाय किशोर का भरोसा जीत कर समस्या का समाधान के लिए राह दिखाना.
  • बेहतर स्व-देखभाल के लिए प्रोत्साहित करना.
  • साथ में पर्याप्त समय व्यतीत करना.
  • अपने मानकों को ऊँचा रखना.
  • उपयुक्त संवाद व्यवस्था कायम करना, जिसमे नोंक-झोंक कम विमर्श ज्यादा हो.
  • निर्णय प्रक्रिया में किशोरों को शामिल करना.
  • किशोरों को नियंत्रित स्वतंत्रता प्रदान करना.

सावधानियां:

रितिका को हमेशा लगता था कि कोई उसके समस्या को समझने का प्रयास ही नहीं कर रहा. उसके शिक्षक और अभिभावकों को उसे आरोपित करने के बजाय तथ्यों के साथ उसके लिए सुधार के बिंदु तय करने थे. मार्गदर्शन और सलाह भी परिस्थिति पर निर्भर करते हैं. परिस्थिति से सामंजस्य के लिए किशोरों को उचित समय और सहयोग दिया जाना चाहिए, जो रितिका को नहीं मिला. कोई भी समस्या यकायक विकराल नहीं होती. कभी-कभी किशोरों के हर व्यवहार को समझाना मुमकिन नहीं होता परन्तु अनेक बार अंदाजा लगाया जा सकता है. मुमकिन है, समस्या किशोरों में ही हो, पर इसके लिए भी किशोरों को सुना जाना और उन्हें समझाना आवश्यक है.

अंतिम सवाल का जवाब अगली कड़ी में.

आत्मनिर्भरता की दिशा में किशोरावस्था की अहम् भूमिका है, अत: सक्रिय और उचित रूप से परवरिश करें. समस्या होने पर किशोर नहीं समस्या को सुधारें.

 

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